बिलासपुर: लिंगियाडीह में पिछले 120 दिनों से चल रहा अनिश्चितकालीन धरना अब सिर्फ एक स्थानीय विरोध नहीं, बल्कि अपने आशियाने, अधिकार और अस्तित्व को बचाने की ऐतिहासिक लड़ाई बन चुका है।
छत्तीसगढ़ के बिलासपुर के इस क्षेत्र में सैकड़ों परिवार बीते चार महीनों से सड़क पर डटे हुए हैं। ये लोग किसी राजनीतिक एजेंडे के तहत नहीं, बल्कि अपने घर-आंगन और जीवन भर की मेहनत से बनाए आशियाने को बचाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं।
“ये सिर्फ घर नहीं, हमारी पूरी जिंदगी है”
आंदोलन में शामिल लोगों का कहना है कि इन मकानों में सिर्फ ईंट-पत्थर नहीं, बल्कि उनकी यादें, भावनाएं और आने वाले कल की उम्मीदें बसी हैं। वर्षों की मेहनत और खून-पसीने की कमाई से खड़े किए गए इन घरों को बचाने के लिए वे हर दिन शांतिपूर्ण तरीके से अपनी आवाज बुलंद कर रहे हैं।
महिलाएं, बुजुर्ग और युवा—सब एक मंच पर
धरना स्थल पर हर दिन महिलाओं, बुजुर्गों और युवाओं की एकजुटता इस आंदोलन को और मजबूत बना रही है। बिना किसी हिंसा या टकराव के, ये लोग अपने अधिकारों के लिए डटे हुए हैं और सरकार से सिर्फ संवेदनशीलता और न्याय की मांग कर रहे हैं।
स्थानीय मुद्दे से बना जन-आंदोलन
चार महीने से लगातार जारी यह आंदोलन अब एक बड़ा सवाल खड़ा कर रहा है—क्या आम नागरिक का घर और उसका सम्मान सुरक्षित है?
लिंगियाडीह का यह संघर्ष अब पूरे प्रदेश में चर्चा का विषय बन गया है और आम जनता के अधिकारों की आवाज बन चुका है।
सरकार से संवाद की मांग
आंदोलनकारियों की स्पष्ट मांग है कि छत्तीसगढ़ सरकार और प्रशासन इस मुद्दे को गंभीरता से लें, उनसे सीधा संवाद स्थापित करें और ऐसा समाधान निकालें जिससे किसी का घर न टूटे और सभी को न्याय मिल सके।
अब फैसला शासन के हाथ में
“लिंगियाडीह बचाओ आंदोलन” ने यह साबित कर दिया है कि जब बात घर और अस्तित्व की आती है, तो आम आदमी भी शांतिपूर्ण तरीके से लंबी लड़ाई लड़ सकता है।
अब नजरें सरकार के फैसले पर टिकी हैं—क्या सैकड़ों परिवारों का आशियाना बचेगा या संघर्ष और लंबा चलेगा?
लिंगियाडीह की आवाज अब पूरे प्रदेश में गूंज रही है… अब देखना यह है कि शासन कब सुनता है!
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