बिलासपुर। छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक धरा एक बार फिर साहित्य, समाजसेवा और सम्मान की उजली परंपरा से आलोकित हुई, जब प्रयास प्रकाशन साहित्य अकादमी द्वारा भव्य वार्षिकोत्सव, विमोचन एवं सम्मान समारोह का आयोजन शासकीय जे.पी. वर्मा कला एवं वाणिज्य महाविद्यालय में किया गया। कार्यक्रम में साहित्य और समाज सेवा के क्षेत्र में योगदान देने वाली विभूतियों को सम्मानित कर नई पीढ़ी के लिए प्रेरणा का दीप प्रज्वलित किया गया।
इस गरिमामयी आयोजन का मुख्य आकर्षण रहा पूर्व जिला एवं सत्र न्यायाधीश सुरेन्द्र तिवारी की चर्चित कृति “सफ़हात का ज़ायका” का विमोचन। साथ ही उन्हें उनके साहित्यिक योगदान के लिए विशेष सम्मान से नवाजा गया। कार्यक्रम में अकादमी द्वारा प्रकाशित सम्मान पत्रिका का भी लोकार्पण किया गया।
सम्मान की विरासत को मिला विस्तार
छः दशकों से साहित्य साधना में रत वरिष्ठ साहित्यकार बुधराम यादव को विशेष रूप से सम्मानित किया गया। इसके साथ ही समाज और विभिन्न क्षेत्रों में उत्कृष्ट कार्य करने वाली विभूतियों को स्मृति सम्मान प्रदान कर कार्यक्रम को गौरवपूर्ण आयाम दिया गया।
इन विभूतियों को मिला प्रतिष्ठित सम्मान
- आँचल पाण्डेय — सहोदरा देवी शर्मा स्मृति नृत्यांगना सम्मान
- रामचरण सोनकर — ताँतूराम सोनकर स्मृति दानवीर सम्मान
- कर्नल (डॉ.) योगेन्द्र शंकर दुबे — गुना देवी तिवारी स्मृति चिकित्सा रत्न सम्मान
- डॉ. प्रदीप शुक्ला — पं. भागीरथी गौरहा स्मृति समाज सेवा सम्मान
- मुरलीधर शर्मा (अधिवक्ता) — चंद्रप्रभा बाजपेयी स्मृति विधि विभूषण सम्मान
- श्रीमती सुनीता विनोद सारथी (सरपंच) — अमरनाथ साव स्मृति समाजसेवी सम्मान
प्रेरक उद्बोधन ने बढ़ाया आयोजन का मान
कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए डॉ. विनय कुमार पाठक ने कहा कि “छत्तीसगढ़ में समाजसेवियों और साहित्यसेवियों के सम्मान की समृद्ध परंपरा रही है, जो समाज को दिशा और नई पीढ़ी को प्रेरणा देती है।”
मुख्य अतिथि न्यायमूर्ति चन्द्रभूषण वाजपेयी ने अपने उद्बोधन में कहा कि “प्रेरक व्यक्तित्वों का सम्मान पूरे समाज को गौरवान्वित करता है और ऐसी कृतियाँ समय की आवश्यकता हैं।”
संस्कृति की सुरमयी शुरुआत
कार्यक्रम का शुभारंभ सरस्वती वंदना एवं स्वागत गीत से हुआ, जिसकी मनमोहक प्रस्तुति राम निहोरा राजपूत ने दी। अतिथियों का आत्मीय स्वागत अकादमी के पदाधिकारियों एवं सदस्यों द्वारा किया गया।
गरिमामयी उपस्थिति और सफल संचालन
कार्यक्रम में साहित्यकारों, समाजसेवियों, अधिवक्ताओं और बुद्धिजीवियों की प्रभावी उपस्थिति रही। संचालन डॉ. राघवेन्द्र कुमार दुबे द्वारा किया गया, जबकि आभार प्रदर्शन डॉ. विवेक तिवारी ने किया।
“जब शब्दों को सम्मान मिलता है, तब समाज को दिशा मिलती है — और बिलासपुर ने फिर साबित किया कि यहां साहित्य सिर्फ लिखा नहीं, जिया जाता है।”















