बिलासपुर को “स्मार्ट सिटी” बनाने का सपना कागज़ पर नहीं, सड़कों पर दिखना चाहिए। लेकिन नगर निगम के जोन कार्यालय क्रमांक 5 परिसर की तस्वीरें कुछ और ही कहानी कहती हैं—पब्लिक की सुविधा के लिए लगाए गए साइन बोर्ड, कबाड़ के पास पड़े हुए।
यहां एक बात साफ कर देना जरूरी है— ये बोर्ड टूटे-फूटे या बेकार नहीं हैं। वे अच्छी स्थिति में, पढ़ने योग्य और तुरंत उपयोग के काबिल हैं।
यहीं से सवाल और तीखा हो जाता है— जब संसाधन जिंदा हैं, तो व्यवस्था क्यों “मृत” दिख रही है?
जनता के पैसे की सीधी बर्बादी
इन साइन बोर्डों पर खर्च हुआ पैसा किसी फाइल का आंकड़ा नहीं, करदाताओं की जेब से निकला धन है।
और जब वही बोर्ड बिना उपयोग के कबाड़ में पड़े रहें, तो यह सिर्फ लापरवाही नहीं—
जनता के पैसे की खुली बर्बादी है।
“Court Road”, “River View”, “बृहस्पति बाजार” जैसे प्रमुख स्थानों के बोर्ड अगर अपनी जगह पर नहीं हैं, तो
- शहर में आने वाला व्यक्ति भटकेगा
- नेविगेशन सिस्टम कमजोर होगा
- और “स्मार्ट सिटी” का दावा खोखला लगेगा
प्रशासन पर सीधे सवाल
- क्या इन बोर्डों को हटाने का कोई आधिकारिक निर्णय हुआ?
- अगर हुआ, तो नई व्यवस्था कहां है?
- अगर नहीं हुआ, तो इन्हें कबाड़ में क्यों रखा गया?
दोनों ही स्थितियों में एक बात साफ है— या तो योजना अधूरी है, या निगरानी नाकाम।
जवाबदेही तय होनी चाहिए
स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट के प्रबंधन, विशेष रूप से एमडी स्तर पर, अब यह स्पष्ट करना जरूरी है कि—
- इन बोर्डों को कब और कहां पुनः स्थापित किया जाएगा?
- इनके निष्क्रिय पड़े रहने की जिम्मेदारी किसकी है?
- और इस दौरान जनता को हुई असुविधा का जवाब कौन देगा?
छोटी लापरवाही, बड़ा संकेत
साइन बोर्ड कोई मामूली चीज नहीं—यह शहर की “दिशा” तय करते हैं। जब दिशा दिखाने वाले ही गायब हों, तो समझिए व्यवस्था किस ओर जा रही है।
न्यूज़ हब इनसाइट का सीधा सवाल
“क्या बिलासपुर स्मार्ट सिटी में सुविधाएं पहले लगती हैं और फिर कबाड़ में चली जाती हैं?”
मुद्दा सिर्फ बोर्ड का नहीं है— मुद्दा है सोच, सिस्टम और जिम्मेदारी का।
जो चीजें काम की हैं, उन्हें कबाड़ में डालना—यही असली बर्बादी है।
अगर यही हाल रहा, तो “स्मार्ट सिटी” एक प्रोजेक्ट नहीं, जनता के पैसे पर किया गया प्रयोग बनकर रह जाएगा।















