बिलासपुर: बांसाझाल पुल नहीं धंसा… जवाबदेही ध्वस्त हो गई!

बांसाझाल पुल हादसा: निर्माण PWD ने किया, रखरखाव राष्ट्रीय राजमार्ग विभाग के पास था, ओवरलोडिंग पर RTO को दोष… लेकिन आखिर जनता जवाब किससे मांगे?

बस बच गई, लेकिन क्या व्यवस्था बची हुई है? रतनपुर-बांसाझाल पुल हादसा पूरे सिस्टम से जवाब मांगता है

रविवार दोपहर का वह दृश्य किसी फिल्म का नहीं, बल्कि सरकारी व्यवस्था की हकीकत का आईना था।


बिलासपुर-रतनपुर-पेंड्रा मार्ग पर बांसाझाल स्थित जलमग्नीय पुल पर यात्रियों से भरी एक बस गुजर रही थी। तभी अचानक तेज धमाके के साथ पुल का निचला स्लैब धंस गया। कुछ ही सेकंड में पुल दो हिस्सों में बंट गया और बस बीच पुल पर फंस गई। बस यदि कुछ फीट और आगे बढ़ जाती, तो शायद आज यह खबर दर्जनों मौतों की होती।

यह हादसा नहीं टला, यह मौत टली है।

इस त्रासदी में यदि किसी की सबसे बड़ी भूमिका रही, तो वह बस चालक की सूझबूझ थी। उसकी त्वरित समझदारी ने बस को नदी में गिरने से बचा लिया और सभी यात्रियों की जान सुरक्षित रही। लेकिन क्या हर बार किसी चालक की बहादुरी पर ही जनता की जान टिकी रहेगी? क्या सरकारी पुलों की सुरक्षा अब ईश्वर और ड्राइवर की किस्मत के भरोसे है?

यह पुल अचानक नहीं टूटा…

तथ्य बताते हैं कि इस पुल का निर्माण बिलासपुर लोक निर्माण विभाग (PWD) संभाग क्रमांक-1 ने कराया था। 14 जून 2016 को यह मार्ग राष्ट्रीय राजमार्ग घोषित हुआ और 9 नवंबर 2017 को इसे राष्ट्रीय राजमार्ग विभाग को हस्तांतरित कर दिया गया।

अर्थात निर्माण एक विभाग ने किया और पिछले लगभग नौ वर्षों से इसका रखरखाव दूसरे विभाग की जिम्मेदारी में था।

यानी अब दो अलग-अलग प्रश्न हैं—

निर्माण गुणवत्ता कैसी थी?

और हैंडओवर के बाद रखरखाव कितना गंभीरता से हुआ?

दोनों की जांच अलग-अलग होनी चाहिए।

जिम्मेदारी तय करने के बजाय जिम्मेदारी टालने की कोशिश

हादसे के बाद कुछ विभागीय अधिकारियों ने ओवरलोड वाहनों की आवाजाही को कारण बताते हुए परिवहन विभाग (RTO) की ओर इशारा करना शुरू कर दिया।

लेकिन यदि यही सच है, तो सवाल और भी गंभीर हो जाते हैं।

यदि वर्षों से ओवरलोड वाहन गुजर रहे थे—

  • क्या राष्ट्रीय राजमार्ग विभाग को इसकी जानकारी नहीं थी?
  • यदि जानकारी थी, तो पुल की भार क्षमता का पुनर्मूल्यांकन क्यों नहीं कराया गया?
  • क्या भार सीमा के बोर्ड लगे थे?
  • क्या भारी वाहनों पर रोक लगाने के लिए कोई संयुक्त अभियान चलाया गया?
  • क्या पुल को कभी “असुरक्षित” घोषित किया गया?

यदि इन सवालों का जवाब “नहीं” है, तो केवल RTO को दोष देकर कोई विभाग अपनी जिम्मेदारी से मुक्त नहीं हो सकता।

सबसे बड़ा सवाल—निरीक्षण हुआ था या नहीं?

सेतु विशेषज्ञों का स्पष्ट मत है कि हर पुल और पुलिया का कम-से-कम वर्ष में दो बार तकनीकी निरीक्षण होना चाहिए। पहले ऐसी निरीक्षण प्रणाली अधिक नियमित थी और विस्तृत रिपोर्ट तैयार होती थी। यदि अब यह व्यवस्था व्यवहार में कमजोर पड़ गई है, तो यह केवल प्रशासनिक कमी नहीं, बल्कि जनता की सुरक्षा के साथ सीधा समझौता है।

अब सरकार को सार्वजनिक रूप से बताना चाहिए—

  • पिछले नौ वर्षों में इस पुल का कितनी बार तकनीकी निरीक्षण हुआ?
  • अंतिम निरीक्षण कब हुआ?
  • निरीक्षण रिपोर्ट में क्या टिप्पणियां थीं?
  • क्या किसी रिपोर्ट में मरम्मत या मजबूतीकरण की सिफारिश की गई थी?
  • यदि की गई थी, तो उस पर कार्रवाई क्यों नहीं हुई?
  • यदि नहीं की गई, तो क्या निरीक्षण वास्तव में हुआ था?

यदि निरीक्षण हुआ था और पुल फिर भी धंस गया, तो निरीक्षण की गुणवत्ता पर सवाल उठेंगे।

यदि निरीक्षण हुआ ही नहीं, तो यह लापरवाही किस स्तर पर हुई?

“जर्जर पुल” पर यातायात क्यों जारी रहा?

घटना के बाद यह भी सामने आया कि पुल पहले से जर्जर था। यदि ऐसा था, तो फिर उस पर यात्रियों से भरी बसें और भारी वाहन क्यों चल रहे थे?

क्या किसी विभाग ने चेतावनी जारी की?

क्या वैकल्पिक मार्ग बनाया गया?

क्या मानसून के दौरान विशेष निगरानी की गई?

यदि उत्तर “नहीं” है, तो यह केवल तकनीकी नहीं, प्रशासनिक विफलता भी है।

जांच केवल औपचारिक नहीं, जवाबदेही वाली हो

इस हादसे की जांच केवल यह बताने तक सीमित नहीं होनी चाहिए कि पुल कैसे टूटा।

जांच यह भी तय करे—

  • निर्माण में कोई तकनीकी कमी थी या नहीं।
  • हैंडओवर के समय पुल की वास्तविक स्थिति क्या थी।
  • रखरखाव के लिए जिम्मेदार एजेंसी ने क्या-क्या किया।
  • ओवरलोड वाहनों पर निगरानी क्यों विफल रही।
  • निरीक्षण प्रणाली क्यों कमजोर हुई।
  • और सबसे महत्वपूर्ण—इस पूरी श्रृंखला में जवाबदेह कौन है?

सबसे खतरनाक स्थिति

हमारे यहां अक्सर हादसे होते हैं, जांच समितियां बनती हैं, रिपोर्टें तैयार होती हैं, फाइलें बंद हो जाती हैं और जिम्मेदारी हवा में गायब हो जाती है।

यदि इस बार भी ऐसा हुआ, तो यह केवल एक पुल का नहीं, बल्कि पूरे प्रशासनिक तंत्र का नैतिक पतन होगा।

क्योंकि जनता यह स्वीकार नहीं करेगी कि—

पुल PWD ने बनाया…

राष्ट्रीय राजमार्ग विभाग ने संभाला…

ओवरलोड वाहन RTO के सामने चलते रहे…

निरीक्षण किसी ने नहीं किया…

बस बीच पुल में फंस गई…

और अंत में जिम्मेदार कोई नहीं निकला।

यह लोकतंत्र नहीं, जवाबदेही से पलायन है।

रतनपुर-बांसाझाल पुल की यह घटना केवल एक सड़क दुर्घटना नहीं है। यह सरकार की अवसंरचना प्रबंधन प्रणाली की कठोर परीक्षा है।

इसलिए इस मामले की स्वतंत्र उच्चस्तरीय तकनीकी और प्रशासनिक जांच होनी चाहिए और उसकी रिपोर्ट सार्वजनिक की जानी चाहिए।

क्योंकि जनता केवल यह नहीं जानना चाहती कि पुल क्यों टूटा।

जनता यह जानना चाहती है कि यदि बस नदी में गिर जाती और दर्जनों लोग मारे जाते, तब जिम्मेदार किसे ठहराया जाता?

और यदि इस प्रश्न का उत्तर आज भी किसी के पास नहीं है, तो मान लीजिए—

टूटा केवल पुल नहीं है… हमारी जवाबदेही की पूरी व्यवस्था ढह चुकी है।

  • पंकज खण्डेलवाल

    Pankaj Khandelwal is the Founder & Principal Editor of News Hub Insight (NHI). He is an independent journalist with expertise in governance, education, public policy, civic issues and investigative reporting. His reporting is based on accuracy, public interest and responsible journalism. Every article published under his editorial supervision follows News Hub Insight's Editorial Policy, Fact Check Policy and Correction Policy.

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