बिलासपुर: उप महानिरीक्षक रजनेश सिंह ने गिनाईं उपलब्धियां, अब असली परीक्षा होगी न्याय की रफ्तार

डिजिटल पुलिसिंग: आंकड़ों से आगे, अब जनता नतीजे देखना चाहती है

बिलासागुड़ी में आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस में उप महानिरीक्षक एवं वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक रजनेश सिंह ने नवीन आपराधिक कानूनों के प्रभावी क्रियान्वयन के संबंध में बिलासपुर पुलिस की उपलब्धियों का विस्तृत विवरण प्रस्तुत किया। eSakshya से लेकर eFSL, eProsecution, eSummons, MedLeaPR और CCTNS जैसी डिजिटल प्रणालियों के व्यापक उपयोग, 1386 अधिकारी-कर्मचारियों के प्रशिक्षण, हजारों डिजिटल प्रविष्टियों तथा राज्य स्तर पर कई श्रेणियों में उल्लेखनीय रैंकिंग का प्रस्तुतिकरण यह दर्शाता है कि बिलासपुर पुलिस तकनीक आधारित आधुनिक पुलिसिंग की दिशा में गंभीरता से आगे बढ़ रही है।

यह परिवर्तन स्वागतयोग्य है। क्योंकि बदलते अपराध, साइबर चुनौतियां और वैज्ञानिक साक्ष्यों की बढ़ती भूमिका के दौर में पारंपरिक पुलिसिंग पर्याप्त नहीं रह गई है। डिजिटल विवेचना समय की आवश्यकता है।

लेकिन हर प्रशासनिक सुधार का एक दूसरा पक्ष भी होता है।

आंकड़े बताते हैं कि सिस्टम कितना सक्रिय है, लेकिन जनता यह तय करती है कि सिस्टम कितना प्रभावी है।

यही वह कसौटी है, जिस पर अब बिलासपुर पुलिस की नई व्यवस्था को परखा जाएगा।

हजारों FIR डिजिटल साक्ष्यों से जुड़ना निश्चित रूप से उपलब्धि है। लेकिन क्या इससे विवेचना की गुणवत्ता भी बेहतर हुई?

सैकड़ों प्रकरण eFSL के माध्यम से भेजे गए। लेकिन क्या फॉरेंसिक रिपोर्ट पहले की तुलना में जल्दी आ रही है?

हजारों न्यायालयीन प्रविष्टियां ऑनलाइन हुईं। लेकिन क्या इससे मुकदमों के निपटारे की गति बढ़ी?

जन-जागरूकता अभियान चलाए गए। लेकिन क्या आम नागरिक वास्तव में अपने नए कानूनी अधिकारों और प्रक्रियाओं से परिचित हो पाया?

यही वे प्रश्न हैं जो डिजिटल पुलिसिंग की वास्तविक सफलता तय करेंगे।

दरअसल, नई आपराधिक न्याय व्यवस्था केवल पुलिस के डिजिटलीकरण का कार्यक्रम नहीं है। इसका उद्देश्य है—तेज विवेचना, वैज्ञानिक साक्ष्य, पारदर्शी प्रक्रिया और समयबद्ध न्याय।

यदि तकनीक केवल रिकॉर्ड बनाने तक सीमित रह जाए और उसका लाभ पीड़ित, गवाह तथा आम नागरिक तक न पहुंचे, तो सुधार अधूरा रह जाएगा।

बिलासपुर पुलिस ने राज्य स्तर पर कई श्रेणियों में उल्लेखनीय स्थान प्राप्त किया है। यह उपलब्धि सराहनीय है। लेकिन अब अगला लक्ष्य केवल रैंकिंग नहीं होना चाहिए।

अगला लक्ष्य होना चाहिए—

क्या हत्या के मामलों की विवेचना पहले से जल्दी पूरी हो रही है?

क्या महिलाओं और बच्चों से जुड़े मामलों में डिजिटल साक्ष्यों के कारण दोषसिद्धि बढ़ी है?

क्या साइबर अपराधों की जांच में समय कम हुआ है?

क्या पीड़ितों को अपने प्रकरण की प्रगति अधिक पारदर्शी तरीके से मिल रही है?

क्या थाने में आने वाले आम नागरिक का अनुभव पहले से बेहतर हुआ है?

यदि इन प्रश्नों के उत्तर सकारात्मक हैं, तो डिजिटल पुलिसिंग वास्तव में सफल कही जाएगी।

एक और महत्वपूर्ण पहलू है—पारदर्शिता।

डिजिटल सिस्टम का सबसे बड़ा लाभ यह होना चाहिए कि अब विवेचना की प्रत्येक महत्वपूर्ण प्रक्रिया रिकॉर्ड हो, देरी का प्रत्येक कारण दर्ज हो और जवाबदेही तय करना पहले से आसान हो जाए।

यदि कोई जांच अनावश्यक रूप से लंबित रहती है, तो सिस्टम यह बताए कि देरी कहां हुई—थाने में, फॉरेंसिक प्रयोगशाला में, अभियोजन में या किसी अन्य स्तर पर। यही डिजिटल पुलिसिंग का वास्तविक मूल्य है।

बिलासपुर पुलिस ने एक मजबूत शुरुआत की है। यह स्वीकार करना चाहिए।

लेकिन जनता का अंतिम निर्णय किसी डैशबोर्ड, किसी पोर्टल या किसी रैंकिंग से नहीं होगा।

जनता केवल एक बात देखेगी—

क्या अब उसे पहले की तुलना में तेज, निष्पक्ष, पारदर्शी और सम्मानजनक पुलिस सेवा मिल रही है?

यदि इसका उत्तर “हाँ” है, तो यह केवल बिलासपुर पुलिस की उपलब्धि नहीं होगी, बल्कि नवीन आपराधिक कानूनों की वास्तविक सफलता होगी।

और यदि अभी भी एक पीड़ित को न्याय के लिए उतना ही इंतजार करना पड़े, जितना पहले करना पड़ता था, तो डिजिटल स्क्रीन पर चमकते आंकड़े भी उस पीड़ा को कम नहीं कर पाएंगे।

डिजिटल पुलिसिंग का पहला चरण पूरा हो चुका है।

अब दूसरा और सबसे कठिन चरण शुरू होता है—आंकड़ों को न्याय में, तकनीक को विश्वास में और व्यवस्था को नागरिक संतोष में बदलने का।

यही वह कसौटी होगी, जिस पर आने वाले वर्षों में बिलासपुर पुलिस की सबसे बड़ी सफलता या सबसे बड़ी चुनौती तय होगी।

  • पंकज खण्डेलवाल

    Pankaj Khandelwal is the Founder & Principal Editor of News Hub Insight (NHI). He is an independent journalist with expertise in governance, education, public policy, civic issues and investigative reporting. His reporting is based on accuracy, public interest and responsible journalism. Every article published under his editorial supervision follows News Hub Insight's Editorial Policy, Fact Check Policy and Correction Policy.

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