Vijay Tande बोले – जानकारी नहीं थी, तो क्या DEO की कुर्सी के योग्य हैं?
अगर DEO को ही नहीं पता, तो निगरानी कौन कर रहा था? बिलासपुर शिक्षा व्यवस्था पर बड़ा सवाल
DEO बोले – मुझे नहीं मालूम!”: बिलासपुर में सीबीएसई कोर्स का खेल चला और शिक्षा विभाग सोता रहा?
बिलासपुर में शिक्षा व्यवस्था को झकझोर देने वाला एक गंभीर मामला सामने आया है। जिला शिक्षा अधिकारी कार्यालय द्वारा जारी कारण बताओ नोटिस ने दो निजी स्कूलों की कार्यप्रणाली पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं—
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Brilliant Public School( व्यापार विहार)
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नारायणा टेक्नो स्कूल
दोनों स्कूलों के प्राचार्यों को नोटिस जारी कर पूछा गया है कि आखिर कक्षा 5वीं और 8वीं के छात्रों को केंद्रीयकृत बोर्ड परीक्षा में क्यों शामिल नहीं कराया गया, जबकि परीक्षा 16 मार्च से 6 अप्रैल 2026 के बीच आयोजित हो रही है।
अभिभावकों को सीबीएसई का भरोसा, मान्यता सीजी बोर्ड की
नोटिस में स्पष्ट उल्लेख है कि इन स्कूलों की मान्यता Chhattisgarh Board of Secondary Education से है, न कि Central Board of Secondary Education से।
इसके बावजूद आरोप है कि
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पालकों को सीबीएसई का भरोसा दिया गया
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उसी आधार पर सीबीएसई के नाम पर शुल्क लिया गया
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और छात्रों को एनसीईआरटी पाठ्यक्रम पढ़ाकर भ्रम पैदा किया गया
अब स्थिति यह है कि 5वीं और 8वीं के बच्चे परीक्षा से बाहर हो गए और उनके भविष्य पर अनिश्चितता का बादल मंडरा रहा है।
नोटिस के बाद भी सबसे बड़ी सजा किसे?
यहां सबसे बड़ा सवाल यह है कि इस पूरे खेल की सबसे बड़ी सजा किसे मिलेगी?
सच यह है कि
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धोखा देने वाला स्कूल प्रबंधन जांच और कार्रवाई का इंतजार करेगा
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लेकिन धोखा खाने वाले बच्चे और उनके परिजन ही सबसे बड़ा सफर तय करेंगे
क्योंकि परीक्षा छूट जाने के बाद
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अभिभावकों को मानसिक और आर्थिक नुकसान उठाना पड़ेगा
यानी षड्यंत्र उजागर होने के बाद भी असली पीड़ा उन्हीं लोगों को झेलनी पड़ेगी जिनकी कोई गलती नहीं है।
क्या यह केवल लापरवाही है या सुनियोजित खेल?
अगर किसी स्कूल की मान्यता एक बोर्ड से है और वह दूसरे बोर्ड के नाम पर पढ़ाई या फीस का मॉडल बना देता है, तो यह सिर्फ प्रशासनिक गलती नहीं लगती।
यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या यह
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मार्केटिंग का खेल था?
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फीस बढ़ाने की रणनीति थी?
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या फिर जानबूझकर किया गया भ्रम फैलाने का षड्यंत्र?
जांच और कार्रवाई की परीक्षा अब प्रशासन की
जिला शिक्षा अधिकारी ने दोनों स्कूलों से 2 दिन में स्पष्टीकरण मांगा है और चेतावनी दी है कि जवाब संतोषजनक नहीं होने पर मान्यता समाप्त करने की कार्रवाई भी की जा सकती है।
साथ ही मामले की जांच के लिए अधिकारियों को नियुक्त कर 7 दिनों में विस्तृत जांच रिपोर्ट देने को कहा गया है।
लेकिन बिलासपुर के अभिभावक अब यह भी पूछ रहे हैं—
– क्या यह मामला केवल नोटिस और जांच तक सीमित रह जाएगा?
– क्या बच्चों के भविष्य से खेलने वालों पर वास्तविक दंडात्मक कार्रवाई होगी?
– या फिर कुछ दिनों बाद यह मामला फाइलों में दब जाएगा?
बिलासपुर का यह मामला केवल दो स्कूलों का विवाद नहीं है।
यह निजी शिक्षा संस्थानों की पारदर्शिता और जवाबदेही की परीक्षा है।
अगर आरोप सही हैं, तो यह केवल नियमों का उल्लंघन नहीं बल्कि बच्चों के भविष्य के साथ खिलवाड़ है।
अब देखना यह है कि
क्या शिक्षा विभाग इस मामले को मिसाल बनाता है, या फिर यह भी उन मामलों में शामिल हो जाएगा जहां गलती उजागर तो होती है, लेकिन सजा कभी नहीं होती।
प्रभारी DEO नोटिस
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