बिलासपुर की बारिश ने विकास के दावों की पोल खोल दी
बारिश ने खोल दी विकास की पोल: कलेक्टर, संभागायुक्त और निगम आयुक्त के बंगले तक जलमग्न
बिलासपुर की बरसात का सबसे बड़ा ‘रिपोर्ट कार्ड’: कलेक्टर, संभागायुक्त और निगम आयुक्त के बंगले तक नहीं बचे
जहां कलेक्टर, संभागायुक्त और निगम आयुक्त के बंगले भी जलमग्न हों, वहां विकास के दावों पर यकीन कैसे करें?
बारिश ने नहीं, भ्रष्ट व्यवस्था ने डुबोया बिलासपुर… सबूत बने कलेक्टर और कमिश्नर के बंगले!
बिलासपुर डूबा, वीआईपी बंगले भी डूबे… अब किस मुंह से गिनाएंगे विकास के दावे?
बिलासपुर में हुई लगातार बारिश ने एक बार फिर उस कड़वी सच्चाई को सामने ला दिया, जिसे हर साल बारिश के साथ नागरिक भुगतते हैं और बारिश खत्म होते ही फाइलों में दफना दिया जाता है। फर्क सिर्फ इतना रहा कि इस बार पानी केवल आम लोगों के घरों और सड़कों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि प्रशासन के सबसे ताकतवर अधिकारियों के सरकारी बंगलों तक पहुंच गया।
शहर में चर्चा रही कि कलेक्टर, संभागायुक्त और नगर निगम आयुक्त के सरकारी आवास भी जलभराव की चपेट में आ गए। वहां से पानी निकालने के लिए विशेष व्यवस्था करनी पड़ी। सवाल यह नहीं है कि पानी उनके बंगलों में क्यों घुसा। सवाल यह है कि यदि शहर की सबसे सुरक्षित और योजनाबद्ध मानी जाने वाली कॉलोनियां भी पानी में डूब सकती हैं, तो आम नागरिकों की बस्तियों का हाल कैसा होगा?
कहा जाता है कि किसी व्यवस्था की असली परीक्षा संकट के समय होती है। बिलासपुर नगर निगम इस परीक्षा में लगातार फेल हो रहा है। हर साल करोड़ों रुपये नालों की सफाई, सीवरेज, सड़क निर्माण, ड्रेनेज सुधार और स्मार्ट सिटी परियोजनाओं पर खर्च होने के दावे किए जाते हैं। वर्षों में विकास के नाम पर हजारों करोड़ रुपये खर्च होने की बात सामने आती रही है। फिर भी पहली तेज बारिश में शहर तालाब क्यों बन जाता है?
क्या विकास केवल टेंडर जारी करने का नाम है? क्या सीमेंट और डामर बिछा देने से शहर स्मार्ट हो जाता है? यदि पानी की निकासी की मूल व्यवस्था ही नहीं सुधरी, तो ऊंची-ऊंची परियोजनाएं सिर्फ कागजों की उपलब्धि बनकर रह जाती हैं।
सबसे बड़ा सवाल जवाबदेही का है।
हर साल जलभराव होता है। हर साल अधिकारी निरीक्षण करते हैं। हर साल समीक्षा बैठक होती है। हर साल नई योजनाओं की घोषणा होती है। लेकिन क्या कभी किसी इंजीनियर, किसी ठेकेदार या किसी जिम्मेदार अधिकारी से पूछा गया कि करोड़ों रुपये खर्च होने के बाद भी समस्या जस की तस क्यों है? यदि नहीं, तो फिर यह विकास नहीं, बल्कि जवाबदेही से भागने की संस्कृति है।
विडंबना देखिए… आम नागरिक के घर में पानी भरता है तो उसे अपनी किस्मत मानकर रातभर बाल्टी से पानी निकालना पड़ता है। लेकिन जब वीआईपी आवास में पानी भरता है तो तत्काल मशीनें, कर्मचारी और संसाधन पहुंच जाते हैं। यही अंतर जनता और व्यवस्था के बीच बढ़ती खाई को उजागर करता है।
अब समय केवल फोटो खिंचवाने, निरीक्षण करने और सोशल मीडिया पर सक्रियता दिखाने का नहीं है। जरूरत है शहर के ड्रेनेज सिस्टम का स्वतंत्र तकनीकी ऑडिट कराने की। यह सार्वजनिक होना चाहिए कि किन परियोजनाओं पर कितना खर्च हुआ, किस एजेंसी ने काम किया, गुणवत्ता कैसी रही और आज उनकी वास्तविक स्थिति क्या है।
बिलासपुर को अब नए वादों की नहीं, पुराने हिसाब की जरूरत है।
बारिश ने इस बार किसी विपक्षी नेता का भाषण नहीं दिया, बल्कि खुद प्रशासन के दरवाजे पर दस्तक देकर बता दिया कि शहर की बुनियादी व्यवस्था बीमार है।
यदि इस चेतावनी के बाद भी नगर निगम और संबंधित एजेंसियां नहीं जागीं, तो आने वाले वर्षों में डूबेगा केवल शहर नहीं, बल्कि जनता का प्रशासन पर बचा-खुचा विश्वास भी।
क्योंकि जिस शहर में अधिकारियों के बंगले तक सुरक्षित नहीं, वहां आम आदमी के सपनों की सुरक्षा की कल्पना करना भी मुश्किल है।















