बिलासपुर का शिक्षा विभाग ‘भगवान भरोसे’! शिक्षा मंत्री गजेंद्र यादव आखिर कितने गंभीर?
जब पूरा शिक्षा विभाग हो जाए ‘अनाथ’… क्या यही है शिक्षा व्यवस्था की मॉनिटरिंग?
शिक्षा मंत्री जी, बिलासपुर का शिक्षा विभाग आखिर किसके भरोसे?
डीईओ नहीं, सहायक संचालक भी छुट्टी पर… बिलासपुर के शिक्षा विभाग की सुध कौन लेगा?
बिलासपुर जिला शिक्षा कार्यालय की तस्वीर इन दिनों सरकारी तंत्र की कार्यशैली पर बड़ा सवाल खड़ा कर रही है। यह कार्यालय आज ऐसी स्थिति में पहुंच गया है, जहां न निर्णय लेने वाला अधिकारी मौजूद है और न ही किसी समस्या का समाधान करने वाला जिम्मेदार चेहरा। सवाल यह है कि आखिर जिले की शिक्षा व्यवस्था का संचालन किसके भरोसे हो रहा है?
जानकारी के अनुसार प्रभारी जिला शिक्षा अधिकारी रामेश्वर जायसवाल पिछले कई दिनों से कार्यालय में नहीं बैठ रहे हैं। आपको बता दें कि कुछ लोगों ने जायसवाल की नियुक्ति को कोर्ट में चेलेंज किया है। दूसरी ओर चारों सहायक संचालक अवकाश पर हैं। अटैचमेंट व्यवस्था समाप्त होने के बाद कई कर्मचारी भी अपने मूल पदस्थापना स्थल लौट चुके हैं। परिणामस्वरूप जिला शिक्षा कार्यालय प्रशासनिक रूप से लगभग नेतृत्वविहीन हो गया है।
सबसे चिंताजनक बात यह है कि शासन ने अब तक किसी अन्य अधिकारी को प्रभार देने की आवश्यकता भी महसूस नहीं की। क्या शासन को यह जानकारी नहीं है कि बिलासपुर जैसे बड़े जिले में हर दिन दर्जनों महत्वपूर्ण फाइलें जिला शिक्षा अधिकारी स्तर पर निर्णय की प्रतीक्षा करती हैं? यदि जानकारी है, तो फिर वैकल्पिक व्यवस्था क्यों नहीं की गई?
हर दिन शिक्षक, कर्मचारी, सेवानिवृत्त अधिकारी, स्कूल प्रबंधन और आम नागरिक अपनी समस्याओं के समाधान की उम्मीद लेकर कार्यालय पहुंचते हैं, लेकिन उन्हें यह कहकर वापस भेज दिया जाता है कि “साहब नहीं हैं।” यह केवल लोगों का समय और पैसा बर्बाद नहीं करता, बल्कि शासन की कार्यशैली पर भी प्रश्नचिह्न लगाता है।
स्थानांतरण, वेतन, सेवा पुस्तिका, पेंशन, अनुकंपा नियुक्ति, वित्तीय स्वीकृतियां, न्यायालयीन प्रकरणों का पालन और अनेक प्रशासनिक कार्य लंबित होने लगे हैं। इसका असर सीधे शिक्षा व्यवस्था और कर्मचारियों के अधिकारों पर पड़ रहा है।
सबसे बड़ा सवाल स्कूल शिक्षा मंत्री गजेंद्र यादव से भी है। जब विभाग की जिम्मेदारी स्वयं मंत्री के पास है, तब उनके ही जिले के महत्वपूर्ण कार्यालय में प्रशासनिक शून्यता क्यों बनी हुई है? यदि किसी अधिकारी के कारण कार्य प्रभावित हो रहे हैं, तो वैकल्पिक व्यवस्था करना शासन का दायित्व है। प्रशासन का उद्देश्य किसी व्यक्ति विशेष पर निर्भर नहीं होना चाहिए।
सरकार अक्सर सुशासन, त्वरित निर्णय और जनहित की बात करती है। लेकिन बिलासपुर जिला शिक्षा कार्यालय की मौजूदा स्थिति इन दावों की वास्तविक परीक्षा है। यदि एक पूरा जिला शिक्षा कार्यालय बिना निर्णय लेने वाले अधिकारी के चल रहा है, तो यह केवल विभागीय लापरवाही नहीं, बल्कि प्रशासनिक जवाबदेही का गंभीर प्रश्न है।
अब समय आ गया है कि शासन तत्काल हस्तक्षेप करे। या तो नियमित जिला शिक्षा अधिकारी की नियुक्ति की जाए अथवा किसी सक्षम अधिकारी को तत्काल प्रभार सौंपा जाए। शिक्षा विभाग को अनिश्चितता और प्रशासनिक शून्यता के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता।
क्योंकि जब शिक्षा विभाग ही निर्णय लेने में असमर्थ हो जाए, तो सबसे बड़ा नुकसान केवल फाइलों का नहीं, बल्कि पूरे शिक्षा तंत्र का होता है।















