जब सरकारी योजना बनी सहारा: जन्म से कटे होंठ-तालू वाले मासूम को मिली नई मुस्कान

छह महीने तक चिरायु टीम ने किया फॉलो-अप, बिलासपुर में सफल सर्जरी के बाद परिवार की लौटी खुशी

बिलासपुर, 15 मार्च 2026। मां की गोद में लेटा छह महीने का वह मासूम अब खिलखिलाकर मुस्कुरा रहा है। लेकिन कुछ समय पहले तक उसके माता-पिता के लिए यह मुस्कान किसी अधूरे सपने जैसी थी। जन्म से ही कटे होंठ और तालू (क्लैफ्ट लिप एवं पैलेट) की समस्या के कारण बच्चा ठीक से दूध भी नहीं पी पा रहा था। हर दिन परिवार चिंता और बेबसी में गुजर रहा था।

आर्थिक रूप से कमजोर परिवार के सामने इलाज का सवाल सबसे बड़ी चुनौती था। तभी उम्मीद बनकर सामने आई राष्ट्रीय बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम (आरबीएसके) की चिरायु टीम, जिसने न सिर्फ बच्चे की पहचान की बल्कि इलाज तक की पूरी राह भी आसान बना दी।

करीब छह महीने पहले प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र सीपत में जन्मे इस बच्चे को जन्मजात विकृति के कारण स्तनपान करने में गंभीर परेशानी हो रही थी। आरबीएसके टीम ने बच्चे की स्थिति देखकर तुरंत उसके माता-पिता से संपर्क किया और उन्हें भरोसा दिलाया कि सर्जरी के जरिए बच्चे का इलाज संभव है।

इसके बाद टीम ने करीब छह महीनों तक बच्चे का नियमित फॉलो-अप किया। इस दौरान उसके वजन, ऊंचाई और सामान्य स्वास्थ्य की जांच की जाती रही और आवश्यक दवाइयां भी उपलब्ध कराई गईं। धीरे-धीरे परिवार का भरोसा बढ़ा और इलाज की प्रक्रिया आगे बढ़ी।

आखिरकार आरबीएसके टीम के सहयोग से स्माइल ट्रेन संस्था के माध्यम से बिलासपुर के लाडिगर अस्पताल में बच्चे का ऑपरेशन कराया गया। डॉक्टरों की टीम ने सफल सर्जरी कर बच्चे की जन्मजात समस्या को ठीक कर दिया।

अब बच्चा स्वस्थ है और सामान्य रूप से दूध पी पा रहा है। अपने बच्चे के चेहरे पर लौटी मुस्कान देखकर परिवार की खुशी का ठिकाना नहीं है। माता-पिता कहते हैं कि अगर समय पर चिरायु टीम का सहयोग नहीं मिलता तो उनके लिए इलाज कराना संभव नहीं था।

बच्चों के लिए संजीवनी बन रही योजना

राष्ट्रीय बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम के तहत आरबीएसके मोबाइल हेल्थ टीम स्कूलों, आंगनबाड़ी केंद्रों, मदरसों और छात्रावासों में जाकर 0 से 18 वर्ष तक के बच्चों का स्वास्थ्य परीक्षण करती है। हर बच्चे का हेल्थ कार्ड बनाया जाता है, जिसमें उसकी पूरी स्वास्थ्य जानकारी दर्ज रहती है।

सामान्य बीमारियों के लिए दवाइयां दी जाती हैं, जबकि जटिल बीमारियों वाले बच्चों को उच्च चिकित्सा केंद्रों में रेफर कर उनका इलाज कराया जाता है। जरूरत पड़ने पर चिरायु वाहन की सुविधा भी उपलब्ध रहती है।

छत्तीसगढ़ में वर्ष 2014 से संचालित यह कार्यक्रम “चिरायु” के नाम से जाना जाता है और हजारों बच्चों को नया जीवन देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है।

आज उस मासूम के चेहरे पर लौटी मुस्कान इस बात का प्रमाण है कि समय पर मिली चिकित्सा और संवेदनशील पहल किसी भी परिवार की जिंदगी बदल सकती है।

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