बारिश नहीं, आदिवासी विभाग के सहायक आयुक्त संजय चंदेल जैसे अधिकारियों की लापरवाही से डूबा छात्रावास

न फोन उठाया, न कॉल बैक किया—छात्रावास अधीक्षक सुरेन्द्र साहू और विनय शंकर शुक्ला

बच्चों को सुविधाएँ देना सरकार का उपकार नहीं, उनका अधिकार है। अब बहानों का नहीं, कार्रवाई का समय है।

बिलासपुर: किसी भी सरकार की संवेदनशीलता का सबसे बड़ा पैमाना यह होता है कि वह अपने सबसे कमजोर वर्ग के बच्चों को कैसी सुविधाएँ उपलब्ध कराती है। आदिवासी एवं अनुसूचित जाति छात्रावास उन विद्यार्थियों के लिए बनाए गए हैं, जो सीमित संसाधनों के बावजूद शिक्षा के माध्यम से अपना भविष्य संवारना चाहते हैं। लेकिन जब उन्हीं छात्रावासों का प्रवेश मार्ग जर्जर हो, खेल मैदान तालाब में बदल जाए और जिम्मेदार अधिकारी इसे सामान्य घटना बताकर अपनी जिम्मेदारी से बचने लगें, तब यह केवल एक प्रशासनिक कमी नहीं, बल्कि व्यवस्था की विफलता है।

न्यूज़ हब इनसाइट की टीम ने बिलासपुर के जरहाभाठा स्थित थ्री-यूनिट आदिवासी बालक छात्रावास, प्री-मैट्रिक अनुसूचित जाति सामूहिक बालक छात्रावास तथा पोस्ट-मैट्रिक आदिवासी बालक छात्रावास का निरीक्षण किया। परिसर में प्रवेश करते ही टूटी-फूटी सड़क ने स्वागत किया। आगे बढ़ने पर खेल मैदान पानी से लबालब मिला। विद्यार्थियों के लिए खेलना तो दूर, सुरक्षित रूप से चलना भी चुनौतीपूर्ण दिखाई दिया।

सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि यदि हर वर्ष बरसात में यही स्थिति बनती है तो अब तक स्थायी समाधान क्यों नहीं किया गया? क्या जल निकासी की व्यवस्था बनाना असंभव है? क्या सड़क की मरम्मत वर्षों से लंबित है? या फिर बच्चों की समस्याएँ विभाग की प्राथमिकता में ही नहीं हैं?

जब छात्रावास अधीक्षक सुरेन्द्र साहू और विनय शंकर शुक्ला से उनका पक्ष जानने का प्रयास किया गया तो उन्होंने न फोन उठाया और न ही बाद में संपर्क किया। सार्वजनिक पद पर बैठे अधिकारियों का यह रवैया पारदर्शिता और जवाबदेही पर गंभीर प्रश्न खड़े करता है।

सहायक आयुक्त चंदेल का यह कहना कि “बारिश में पानी भर जाता है और विभाग के पास भारी-भरकम फंड नहीं है”, समस्या का समाधान नहीं है। यदि वास्तव में बजट नहीं है, तो क्या शासन को विस्तृत प्रस्ताव भेजा गया? क्या कलेक्टर, आयुक्त या विभागीय सचिव को पत्र लिखकर अतिरिक्त राशि की मांग की गई? क्या किसी वैकल्पिक मद से मरम्मत कराने का प्रयास हुआ? यदि इन प्रश्नों का उत्तर ‘नहीं’ है, तो स्पष्ट है कि कमी केवल धन की नहीं, इच्छाशक्ति की भी है।

प्रशासनिक सेवा का मूल सिद्धांत है कि समस्या आने पर समाधान खोजा जाए, न कि बहाने। एक जिम्मेदार अधिकारी की पहचान उसके पास उपलब्ध बजट से नहीं, बल्कि समस्या के समाधान के लिए किए गए प्रयासों से होती है। यदि विभाग संसाधनों की कमी का दावा करता है, तो उसके पास उस कमी को दूर करने के लिए किए गए पत्राचार, प्रस्ताव और अनुस्मारकों का रिकॉर्ड भी होना चाहिए।

विडंबना यह है कि करोड़ों रुपये विभिन्न योजनाओं पर खर्च किए जाते हैं, लेकिन छात्रावासों में रहने वाले गरीब और आदिवासी विद्यार्थियों के लिए सुरक्षित प्रवेश मार्ग और उपयोगी खेल मैदान जैसी बुनियादी सुविधाएँ भी सुनिश्चित नहीं हो पा रही हैं। यह स्थिति न केवल विभागीय कार्यप्रणाली पर प्रश्नचिह्न लगाती है, बल्कि यह भी दर्शाती है कि बच्चों की आवश्यकताएँ प्रशासनिक प्राथमिकताओं में पीछे छूट गई हैं।

न्यूज़ हब इनसाइट का मानना है कि इस मामले में केवल आश्वासन पर्याप्त नहीं होगा। आवश्यक है कि—

  • जर्जर प्रवेश मार्ग की तत्काल मरम्मत कराई जाए।
  • खेल मैदान से स्थायी जल निकासी की व्यवस्था विकसित की जाए।
  • पूरे परिसर का तकनीकी निरीक्षण कराकर विस्तृत कार्ययोजना बनाई जाए।
  • यदि बजट की कमी है तो शासन को भेजे गए सभी प्रस्ताव एवं पत्राचार सार्वजनिक किए जाएँ।
  • जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय करते हुए कार्यों की समय-सीमा घोषित की जाए।

यह मुद्दा राजनीति का नहीं, उन बच्चों के सम्मान और अधिकारों का है जो बेहतर भविष्य की उम्मीद लेकर सरकारी छात्रावासों में रह रहे हैं। यदि हम उन्हें सुरक्षित और सम्मानजनक वातावरण भी उपलब्ध नहीं करा सकते, तो विकास और सामाजिक न्याय के दावे केवल कागज़ों तक सीमित रह जाएंगे।

बच्चों को सुविधाएँ देना सरकार का उपकार नहीं, उनका अधिकार है। अब बहानों का नहीं, कार्रवाई का समय है।

 

  • पंकज खण्डेलवाल

    Pankaj Khandelwal is the Founder & Principal Editor of News Hub Insight (NHI). He is an independent journalist with expertise in governance, education, public policy, civic issues and investigative reporting. His reporting is based on accuracy, public interest and responsible journalism. Every article published under his editorial supervision follows News Hub Insight's Editorial Policy, Fact Check Policy and Correction Policy.

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