जब फर्जी मौतें फाइलों में जिंदा हो जाती हैं
बिलासपुर का कथित सर्पदंश मुआवजा घोटाला यदि जांच में सिद्ध होता है, तो यह किसी एक विभाग, एक कर्मचारी या एक डॉक्टर की कहानी नहीं है। यह उस पूरी प्रशासनिक श्रृंखला का आईना है जहाँ कागज पर लिखी गई एक बात सरकारी सत्य बन जाती है और उसी के आधार पर सरकारी खजाने से पैसा निकल जाता है।
इस मामले का सबसे खतरनाक पहलू पैसा नहीं है। सबसे खतरनाक पहलू यह है कि यदि एक मृत्यु का कारण बदला जा सकता है, तो सरकारी रिकॉर्ड की विश्वसनीयता पर ही प्रश्न खड़ा हो जाता है। आज यदि मृत्यु का कारण बदल सकता है, तो कल दुर्घटना, प्राकृतिक आपदा, भूमि अधिग्रहण, बीमा दावा या किसी अन्य सरकारी योजना के दस्तावेज भी संदेह के घेरे में आ सकते हैं।
इस पूरे प्रकरण में तीन बातें सबसे गंभीर हैं।
पहली, यह किसी एक व्यक्ति द्वारा किया जाने वाला अपराध प्रतीत नहीं होता। मुआवजा स्वीकृत होने की प्रक्रिया में स्वास्थ्य विभाग, पुलिस, राजस्व विभाग, बैंकिंग प्रक्रिया और प्रशासनिक अनुमोदन जैसी कई कड़ियाँ होती हैं। यदि जांच में संगठित मिलीभगत सिद्ध होती है, तो यह संस्थागत विफलता का मामला होगा।
दूसरी, यह घोटाला केवल सरकारी धन की हानि नहीं है। हर फर्जी भुगतान का अर्थ है कि किसी वास्तविक पीड़ित के हिस्से का संसाधन कम हुआ। राहत योजनाओं पर जनता का भरोसा भी कमजोर हुआ।
तीसरी, सबसे बड़ा खतरा ‘भ्रष्टाचार का सामान्यीकरण’ है। यदि वर्षों तक फर्जी दावे बिना पकड़े स्वीकृत होते रहे, तो इसका अर्थ है कि निगरानी, ऑडिट और सत्यापन की व्यवस्था पर्याप्त नहीं थी। ऐसी स्थिति किसी भी कल्याणकारी योजना के लिए गंभीर चेतावनी है।
अब जांच केवल गिरफ्तारी तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। जनता यह जानना चाहती है—
- यह नेटवर्क कब और कैसे शुरू हुआ?
- किन स्तरों पर स्वीकृतियाँ दी गईं?
- क्या किसी अधिकारी ने आपत्ति दर्ज की थी?
- संदिग्ध भुगतान की वसूली कैसे होगी?
- भविष्य में ऐसी घटनाएँ रोकने के लिए क्या सुधार किए जाएंगे?
इस मामले को केवल एक आपराधिक केस मानकर बंद करना पर्याप्त नहीं होगा। यदि इससे शासन की प्रक्रियाओं में सुधार नहीं हुआ, तो यह अवसर भी व्यर्थ चला जाएगा।
लोकतंत्र में सबसे बड़ा दंड केवल जेल नहीं होता; सबसे बड़ा दंड है—सत्य का पूरी तरह सामने आना और जवाबदेही तय होना। इसलिए जांच निष्पक्ष, वैज्ञानिक, समयबद्ध और बिना किसी दबाव के अंतिम निष्कर्ष तक पहुँचे, यही जनहित की अपेक्षा है।
याद रखिए—जब सरकारी फाइलें सच और झूठ का अंतर खोने लगती हैं, तब खतरा केवल खजाने को नहीं, पूरे शासन तंत्र की विश्वसनीयता को होता है।
आपको बता दें कि वर्ष 2021 से 2024 के बीच सर्पदंश से हुई 431 मौतों और 17 करोड़ 24 लाख रुपये के मुआवजा आवंटन में हुए बड़े फर्जीवाड़े की जांच जारी है। सिम्स अस्पताल के फर्जी मर्ग नंबर, कूटरचित पोस्टमार्टम रिपोर्ट और गलत नाम-पते के आधार पर फांसी, हार्ट अटैक या आत्महत्या जैसी मौतों को सर्पदंश बताकर चार-चार लाख रुपये की सरकारी राशि हड़पी गई थी।
विधानसभा में बेलतरा के विधायक सुशांत शुक्ला ने यह मुद्दा उठाया। उन्होंने ध्यानाकर्षण प्रस्ताव के जरिए फर्जीवाड़े की ओर ध्यान खींचा। इसके बाद सदन में काफी हंगामा भी हुआ। राजस्व मंत्री टंकराम वर्मा ने उच्च स्तरीय जांच का भरोसा दिया था। शासन के नियमानुसार सर्पदंश पर 4 लाख रुपये मुआवजा मिलता है। इसी राशि को हड़पने के लिए यह पूरा सिंडिकेट बनाया गया।
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, पुलिस जांच में चौंकाने वाला खुलासा हुआ है। तहसील कार्यालय का ड्राइवर गोविंद विश्वकर्मा इस कांड का मास्टरमाइंड निकला। उसने ही गिरोह बनाकर पूरा फर्जीवाड़ा रचा। ड्राइवर के साथ वकील और अन्य लोग भी शामिल थे। पुलिस ने वकील हीराप्रसाद खांडेकर और बैंककर्मी कुशकुमार गुप्ता को पकड़ा है। मुख्य सरगना वकील श्रवण वस्त्रकार अभी फरार है।







