बिलासपुर। गोस्वामी तुलसीदास की जयंती पर बिलासपुर में साहित्य, संस्कृति और अध्यात्म का अनूठा संगम देखने को मिलेगा। ओंकारेश्वर सेवा समिति सागा ले-आउट शुभम विहार, प्रयास प्रकाशन साहित्य अकादमी बिलासपुर और नवनीत मानस समिति पुरान, जिला मुंगेली के संयुक्त तत्वावधान में 19 अगस्त को तुलसी जयंती के अवसर पर राष्ट्रीय विमर्श, विराट कवि सम्मेलन, भजन-संगीत, पुस्तक विमोचन और सम्मान समारोह का भव्य आयोजन किया जा रहा है।
ओंकारेश्वर महादेव मंदिर परिसर में सुबह 9 बजे तुलसी प्रतिमा पर माल्यार्पण एवं पूजन के साथ कार्यक्रम की शुरुआत होगी। इसके बाद तुलसी भजन-संगीत का आयोजन होगा। दोपहर 12:30 बजे विराट कवि सम्मेलन और शाम 4 बजे तुलसी साहित्य पर राष्ट्रीय संगोष्ठी आयोजित की जाएगी। संगोष्ठी में तुलसी साहित्य की परंपरागत मान्यताओं के साथ-साथ वर्तमान सामाजिक एवं साहित्यिक परिवेश में उसकी प्रासंगिकता पर गहन विमर्श किया जाएगा।
तुलसी साहित्य पर होगा राष्ट्रीय मंथन
आयोजकों के अनुसार छत्तीसगढ़ में तुलसी जयंती के अवसर पर इस स्तर का आयोजन पहली बार होने जा रहा है। संगोष्ठी का उद्देश्य तुलसी के संपूर्ण साहित्य का समकालीन संदर्भों में पुनर्मूल्यांकन करते हुए विमर्श से महत्वपूर्ण एवं केंद्रीय निष्कर्ष सामने लाना है।
कार्यक्रम में पद्मश्री पंडित रामलाल बरेठ मुख्य अतिथि होंगे। अतिविशिष्ट अतिथियों में डॉ. विनय कुमार पाठक, कुलपति थावे विद्यापीठ बिहार एवं पूर्व अध्यक्ष राजभाषा आयोग छत्तीसगढ़ तथा न्यायमूर्ति डॉ. चंद्र भूषण वाजपेयी, पूर्व न्यायाधीश छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय शामिल होंगे।
समारोह की अध्यक्षता डॉ. रमेश चंद्र श्रीवास्तव (आईएसएस), समीक्षक एवं साहित्यकार करेंगे। विशिष्ट अतिथियों में डॉ. श्याम लाल निराला, पूर्व प्राचार्य जेपी महाविद्यालय बिलासपुर, समाजसेवी शैलेंद्र सिंह कछवाहा तथा छत्तीसगढ़ शासन के सिंचाई विभाग के एसडीओ शंकर लाल गेंदले उपस्थित रहेंगे।
90 विभूतियों का होगा सम्मान
कार्यक्रम के अंतिम चरण में साहित्य, शिक्षा, कला एवं विभिन्न क्षेत्रों में उल्लेखनीय योगदान देने वाली 90 विभूतियों को सम्मानित किया जाएगा। वहीं नवनीत मानस समिति पुरान, मुंगेली द्वारा पीएचडी एवं डी.लिट. प्राप्त मनीषियों को ‘नवनीत मानस’ से अलंकृत किया जाएगा।
आयोजन को लेकर संयोजक विष्णु कुमार तिवारी और सह-संयोजक दीपक दूबे ‘सागर’ तैयारियों में जुटे हुए हैं। आयोजकों का कहना है कि यह आयोजन तुलसीदास के साहित्य को केवल परंपरा के दायरे में देखने के बजाय उसे वर्तमान समय की चुनौतियों और सामाजिक संदर्भों से जोड़कर समझने की दिशा में महत्वपूर्ण पहल साबित होगा।







