सीएमएचओ डॉ. शुभ्रा गरेवाल की भूमिका पर उठे गंभीर सवाल
बिलासपुर: छत्तीसगढ़ के स्वास्थ्य विभाग में एक बार फिर गंभीर अनियमितता और प्रशासनिक लापरवाही का बड़ा मामला सामने आया है। आरटीआई एक्टिविस्ट (RTI Activist) रविंद्र तिवारी से मिली जानकारी और उनके द्वारा प्रस्तुत साक्ष्यों के आधार पर यह खुलासा हुआ है कि बिल्हा सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (CHC) में बीएमओ और एक फर्जी समिति द्वारा लाखों रुपये कीमत के शासकीय उपकरणों एवं सामग्रियों को महज 20,276 रुपये में लोहा और प्लास्टिक का कबाड़ बताकर बेच दिया गया। रविंद्र तिवारी का आरोप है कि इस पूरे खेल में नियमों की धज्जियां उड़ाई गईं और सरकारी खजाने को भारी वित्तीय क्षति पहुंचाई गई है।
कंडम करने के नियमों की सरेआम धज्जियां
रविंद्र तिवारी ने बताया कि सरकारी अस्पतालों और कार्यालयों के अप्रचलित या खराब हो चुके उपकरणों को कंडम करने के लिए ‘सामान्य वित्त नियम’ (GFR 217) के नियम 217 से 223 तक स्पष्ट प्रावधान हैं। सामग्री को तभी कंडम माना जा सकता है जब उसकी तकनीकी आयु समाप्त हो चुकी हो, मरम्मत संभव न हो या वह अप्रचलित हो चुकी हो। इसके लिए विस्तृत सूची (खरीद तिथि, मूल कीमत सहित), तकनीकी विशेषज्ञों वाली कंडमनेशन कमेटी का गठन, भौतिक निरीक्षण और ‘Form GFR 10’ पर हस्ताक्षर अनिवार्य होते हैं। साथ ही, सक्षम प्राधिकारी की वित्तीय अनुमति और नियमों के तहत सार्वजनिक नीलामी या निविदा प्रक्रिया अपनाई जानी चाहिए।
रविंद्र तिवारी के अनुसार, बिल्हा स्वास्थ्य केंद्र में इन सभी प्रशासनिक और कानूनी नियमों को कचरे के डिब्बे में डाल दिया गया।
फर्जी समिति और कागजी खानापूर्ति का खेल
रविंद्र तिवारी द्वारा दी गई जानकारी के अनुसार:
- अधूरी और फर्जी सूची: कंडम की गई 1 से 43 बिंदुओं की सूची में केवल उपकरणों के नाम दर्ज हैं। सामग्री कब खरीदी गई, उसकी मूल कीमत क्या थी, किस कंपनी की थी और उसकी अवसान तिथि क्या थी, इसका कोई उल्लेख नहीं है।
- विशेषज्ञों का अभाव: इस सूची में डॉ. श्रीकेश गुप्ता, डॉ. निकिता कंवर, डॉ. सान्या तिवारी, अनिल गढ़ेवाल, वाई.आर. वाल्टर (MLT), नलिनी सिंह (स्टाफ नर्स) और हरि शंकर साहू (फर्मासिस्ट) के हस्ताक्षर तो हैं, लेकिन सूची में किसी भी तकनीकी विशेषज्ञ या सक्षम प्राधिकृत अधिकारी की संलिप्तता का कोई स्पष्ट उल्लेख नहीं है।
- फर्जी कोटेशन: मुस्तफा प्लास्टिक (मगरपारा चौक), आर.के. ट्रेडर्स (मंगला चौक) और राज प्लास्टिक (मगरपारा) के नाम से जो कोटेशन तैयार किए गए, वे कथित तौर पर एक ही व्यक्ति की हैंडराइटिंग में लिखे गए पाए गए, जो स्पष्ट रूप से मिलीभगत की ओर इशारा करते हैं।
नियम विरुद्ध अटैचमेंट और रात के अंधेरे में खेल
रविंद्र तिवारी ने खुलासा किया कि मामले में सबसे बड़ा सवाल एक फार्मासिस्ट की भूमिका को लेकर उठ रहा है। हरि शंकर साहू, जिनकी पोस्टिंग मूल रूप से जिला कार्यालय के स्टोर में है और जिनका संलग्नीकरण (Attachment) समाप्त हो चुका है, उन्हें सीएमएचओ द्वारा अनधिकृत रूप से सीएचसी बिल्हा में पदस्थ रखा गया है। रविंद्र तिवारी के अनुसार, इसी फार्मासिस्ट द्वारा निखिल सिंह राजपूत को सामग्री विक्रय करने का प्रमाण पत्र जारी किया गया, जबकि उन्हें इसका कोई कानूनी अधिकार ही नहीं था।
रविंद्र तिवारी तथा प्रत्यक्षदर्शियों के हवाले से बताया गया कि रात 12 बजे के बाद विशेष निगरानी में ट्रकों में कबाड़ के नाम पर उन उपकरणों और सामग्रियों को भी लोड कर बाहर निकाला गया, जो पूरी तरह से चालू हालत में थे और जिनकी वर्तमान कीमत लाखों में थी। इस संदिग्ध गतिविधि की तस्वीरें स्थानीय समाचार पत्रों में भी प्रकाशित हुई थीं।
सरकारी खजाने की बजाय ‘जीवनदीप समिति’ के खाते में हेरफेर
रविंद्र तिवारी ने बताया कि नियमों के मुताबिक, सरकारी संपत्ति की नीलामी से प्राप्त राशि सीधे शासकीय कोष (Government Treasury) में जमा होनी चाहिए। परंतु इस मामले में निखिल सिंह राजपूत से प्राप्त 20,276 रुपये की राशि को शासन के खाते में जमा न करवाकर ‘जीवनदीप समिति’ के खाते में डलवाया गया, जिसे बाद में फर्जी खर्च बिल लगाकर निकाले जाने की आशंका है।
सीएमएचओ की भूमिका पर उठे गंभीर सवाल
रविंद्र तिवारी द्वारा उजागर किए गए इस पूरे प्रकरण ने मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी (CMHO) की कार्यप्रणाली पर भी गंभीर सवाल खड़े किए हैं:
- जिस फार्मासिस्ट का संलग्नीकरण समाप्त हो चुका है, वह आज भी बिल्हा में क्यों जमा हुआ है और क्या उसे सीएमएचओ का प्रत्यक्ष संरक्षण प्राप्त है?
- क्या सीएमएचओ बिल्हा सीएचसी स्टोर के स्थायी, अस्थायी उपकरण स्टॉक रजिस्टर और वितरण रजिस्टर की निष्पक्ष जांच कराने की हिम्मत जुटा पाएंगे?
- क्या यह सब अवैध धन उगाही और निजी स्वार्थ के लिए रची गई कोई सोची-समझी साजिश है?
रविंद्र तिवारी का कहना है कि यदि इस गंभीर मामले की उच्च स्तरीय जांच कमेटी से निष्पक्ष जांच नहीं कराई गई, तो यह स्पष्ट हो जाएगा कि इस भ्रष्टाचार में उच्च स्तर पर बैठे संरक्षणदाता भी लिप्त हैं। उन्होंने शासन-प्रशासन से मांग की है कि इस पूरे फर्जीवाड़े की त्वरित और निष्पक्ष जांच कर दोषियों के खिलाफ कड़ी कानूनी कार्रवाई की जाए।







