छह केस, 307 का आरोपी… फिर भी नहीं टूटा हौसला! आयुष यादव की गिरफ्तारी ने सिस्टम पर खड़े किए बड़े सवाल
वर्दी की साख पर सवाल या सिस्टम की विफलता? ब्लैकमेल गैंग ने समाज को क्या संदेश दिया
बिलासपुर: सरकंडा पुलिस द्वारा उजागर किया गया कथित ब्लैकमेल और उगाही का मामला केवल 14.50 लाख रुपये और लगभग 450 ग्राम सोने के जेवरात की कथित हड़प का मामला नहीं है। यह कानून के डर, परिवारों की सुरक्षा और अपराधियों के बढ़ते दुस्साहस पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
पुलिस के अनुसार इस मामले में आयुष यादव, आदर्श शर्मा, प्रिंस साहू और आदित्य पांडे को गिरफ्तार किया गया है, जबकि प्रियम शर्मा और शौर्य करोलिया अभी फरार बताए गए हैं। आरोप है कि पीड़ित परिवार की युवती को उसके परिजनों और छोटे बच्चों की हत्या तथा दुर्घटना कराने की धमकी देकर महीनों तक भय के साये में रखा गया। इसी डर का फायदा उठाकर कथित रूप से बैंक खातों से 14.50 लाख रुपये निकलवाए गए और बाद में लगभग 450 ग्राम सोने के आभूषण भी ले लिए गए।
लेकिन इस पूरे मामले का सबसे चौंकाने वाला पहलू वह है, जिसकी चर्चा शहर भर में हो रही है। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार मुख्य आरोपी आयुष यादव, सीपत थाने में पदस्थ एएसआई धर्मेंद्र यादव का पुत्र है। यदि यह तथ्य सही है, तो यह केवल एक परिवार का मामला नहीं, बल्कि पुलिस व्यवस्था की छवि पर भी सवाल खड़ा करता है। अपराध की जिम्मेदारी व्यक्ति की होती है, परिवार की नहीं; फिर भी जब किसी पुलिसकर्मी के परिजन पर ऐसे गंभीर आरोप लगते हैं, तो स्वाभाविक रूप से जनता की नजरें पूरे तंत्र की जवाबदेही पर टिक जाती हैं।
मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, आयुष यादव के विरुद्ध विभिन्न थानों में पहले से छह मामले दर्ज हैं और वह भारतीय न्याय संहिता/पूर्व आईपीसी की धारा 307 (हत्या के प्रयास) जैसे गंभीर प्रकरण में भी आरोपी रह चुका है। यदि यह रिकॉर्ड सही है, तो यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि आखिर इतने मामलों के बावजूद उसका हौसला क्यों नहीं टूटा? क्या समय रहते प्रभावी कार्रवाई होती, तो क्या यह कथित ब्लैकमेल कांड टाला जा सकता था?
यह सवाल केवल पुलिस से नहीं, पूरे आपराधिक न्याय तंत्र से है। बार-बार अपराध के आरोप झेलने वाले व्यक्तियों की निगरानी, समयबद्ध विवेचना, अभियोजन और न्यायिक प्रक्रिया में तेजी क्यों नहीं दिखाई देती? यदि अपराधी को यह भरोसा हो जाए कि कानून की पकड़ कमजोर है, तो उसका दुस्साहस बढ़ना तय है।
इस मामले में सरकंडा पुलिस ने त्वरित कार्रवाई करते हुए चार आरोपियों को गिरफ्तार किया, नकदी, आभूषण, मोबाइल और कथित अपराध की रकम से खरीदी गई एक्टिवा जब्त की। यह कार्रवाई सराहनीय है। लेकिन असली सफलता तब मानी जाएगी, जब फरार आरोपियों की गिरफ्तारी होगी, कथित रूप से हड़पी गई पूरी संपत्ति बरामद होगी और यदि किसी स्तर पर संरक्षण, लापरवाही या प्रभाव का दुरुपयोग हुआ है तो उसकी भी निष्पक्ष जांच होगी।
यह घटना हर परिवार के लिए भी चेतावनी है। ब्लैकमेल का सबसे बड़ा हथियार बंदूक नहीं, बल्कि डर होता है। अपराधी पहले पीड़ित को मानसिक रूप से तोड़ते हैं, फिर उसकी चुप्पी को अपनी ताकत बना लेते हैं। यदि समय रहते परिवार, मित्र या पुलिस तक बात पहुँच जाए, तो ऐसे अपराधों की श्रृंखला प्रारंभ में ही टूट सकती है।
कानून का सम्मान तभी बढ़ेगा, जब उसका भय अपराधियों में दिखाई देगा, पीड़ितों में नहीं। समाज को यह भरोसा चाहिए कि चाहे आरोपी कितना भी प्रभावशाली क्यों न हो, उसका पारिवारिक या सामाजिक परिचय चाहे जो हो, कानून की नजर में सभी समान हैं। यही विश्वास लोकतंत्र और न्याय व्यवस्था की सबसे बड़ी ताकत है।







