कुलपति डॉ. विनय कुमार पाठक बोले – भारतीय ज्ञान व्यवस्था विश्व मानवता के लिए अमूल्य धरोहर, नई पीढ़ी तक पहुंचाना समय की मांग

भारतीय ज्ञान परंपरा का वैश्विक महाकुंभ: रायगढ़ से बुल्गारिया, नॉर्वे, अमेरिका और कनाडा तक गूंजी हिंदी की स्वर-धारा

रायगढ़, 30 मई। भारतीय ज्ञान परंपरा, हिंदी भाषा और वैश्विक सांस्कृतिक चेतना को समर्पित एक ऐतिहासिक अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी एवं काव्य-पाठ का आयोजन रायगढ़ में सम्पन्न हुआ, जिसमें भारत सहित बुल्गारिया, नॉर्वे, अमेरिका, कनाडा और नीदरलैंड के विद्वानों एवं साहित्यकारों ने सहभागिता कर भारतीय ज्ञान की वैश्विक प्रासंगिकता पर मंथन किया।

विश्व हिन्दी अधिष्ठान (न्यास), रायगढ़ एवं देवम् फाउंडेशन कला एवं संस्कृति संस्थान, बुल्गारिया के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित इस अंतरराष्ट्रीय आयोजन में शहीद नंदकुमार पटेल विश्वविद्यालय रायगढ़ के कुलपति डॉ. विनय कुमार चौहान तथा थावे विद्यापीठ, गोपालगंज (बिहार) के कुलपति एवं छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग के पूर्व अध्यक्ष डॉ. विनय कुमार पाठक मुख्य अतिथि रहे।

कार्यक्रम के मुख्य वक्ता प्रख्यात साहित्यकार डॉ. श्रीराम परिहार तथा काव्य-पाठ सत्र के अध्यक्ष नॉर्वे के वरिष्ठ प्रवासी साहित्यकार डॉ. सुरेश चंद्र शुक्ल रहे।

‘भारतीय शोध-बोध’ अंतरराष्ट्रीय शोध पत्रिका की घोषणा

अपने उद्बोधन में कुलपति डॉ. विनय कुमार चौहान ने भारतीय ज्ञान परंपरा को वैश्विक स्तर पर स्थापित करने की आवश्यकता पर बल देते हुए ‘वंदे मातरम्’ की सांस्कृतिक चेतना, नई शिक्षा नीति और भारतीय ज्ञान प्रणाली के अकादमिक समावेशन पर प्रकाश डाला। उन्होंने ‘भारतीय शोध-बोध’ नामक अंतरराष्ट्रीय शोध पत्रिका प्रारंभ करने की महत्वपूर्ण योजना भी साझा की।

‘ऋषि और कृषि’ से समझाया भारतीय ज्ञान का दर्शन

मुख्य वक्ता डॉ. श्रीराम परिहार ने भारतीय ज्ञान परंपरा को केवल शास्त्रीय विमर्श नहीं बल्कि भारतीय जीवन-दृष्टि और जीवन-पद्धति बताया। उन्होंने वेदों के महावाक्यों ‘तत्त्वमसि’, ‘अहं ब्रह्मास्मि’, ‘प्रज्ञानं ब्रह्म’ और ‘अयमात्मा ब्रह्म’ की व्याख्या करते हुए भारतीय चिंतन को ज्ञान और कर्म के अद्भुत समन्वय के रूप में प्रस्तुत किया। ‘ऋषि और कृषि’ के उदाहरण ने श्रोताओं को विशेष रूप से प्रभावित किया।

डॉ. विनय कुमार पाठक ने बताया भारतीय शब्दों का वैश्विक प्रभाव

थावे विद्यापीठ के कुलपति डॉ. विनय कुमार पाठक ने अपने सारगर्भित व्याख्यान में भारतीय भाषाओं के मूल शब्दों और उनके अंग्रेजी सहित अन्य भाषाओं में रूपांतरण पर रोचक उदाहरण प्रस्तुत किए। उन्होंने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा केवल अतीत की विरासत नहीं, बल्कि विश्व मानवता के भविष्य का मार्गदर्शक चिंतन है। भाषा, संस्कृति और जीवन-मूल्यों पर आधारित इस ज्ञान-संपदा को नई पीढ़ी तक पहुंचाना आज की सबसे बड़ी आवश्यकता है।

पूर्वोत्तर भारत से लेकर यूरोप और अमेरिका तक हुआ ज्ञान-विमर्श

संगोष्ठी में मिजोरम केंद्रीय विश्वविद्यालय के डॉ. सुशील कुमार शर्मा, सोफिया विश्वविद्यालय बुल्गारिया के प्रो. जय कौशल, अमेरिका से डॉ. वीणा विज उदित एवं डॉ. मृदुल कीर्ति, छत्तीसगढ़ के साहित्यकार डॉ. रमेशचंद्र श्रीवास्तव तथा रीना झा ने भारतीय ज्ञान परंपरा के विविध आयामों—लोक संस्कृति, वैदिक ज्ञान, विज्ञान, नक्षत्र विज्ञान, सांस्कृतिक मूल्यों और आधुनिक संदर्भों—पर विचार रखे।

वेद, उपनिषद, ज्योतिष और विज्ञान का समग्र विश्लेषण

कार्यक्रम की समीक्षा प्रस्तुत करते हुए डॉ. बेठियार सिंह साहू ने भारतीय ज्ञान परंपरा को वेद, उपनिषद, दर्शन, भूगोल, खगोल, ज्योतिष, चिकित्सा विज्ञान एवं धातु विज्ञान जैसे विषयों से जोड़ते हुए इसकी व्यापकता का विश्लेषण किया।

रात 12 बजे तक चला अंतरराष्ट्रीय काव्य-पाठ

संगोष्ठी के बाद आयोजित अंतरराष्ट्रीय काव्य-पाठ सत्र में नॉर्वे, कनाडा, अमेरिका, बुल्गारिया, नीदरलैंड और भारत के प्रतिष्ठित साहित्यकारों ने अपनी रचनाओं का पाठ किया। इस दौरान डॉ. सुरेश चंद्र शुक्ल ने साहित्य को मानव मूल्यों के संरक्षण का सशक्त माध्यम बताते हुए रचनाकारों का उत्साहवर्धन किया।

काव्य-पाठ में डॉ. स्नेह ठाकुर, डॉ. शैलजा सक्सेना, डॉ. कादम्बरी आदेश, डॉ. करुणा पांडे, अश्विनी केगांवकर, डॉ. ज्ञानेश्वरी सिंह, मनीष पांडेय, डॉ. मौना कौशिक सहित अनेक अंतरराष्ट्रीय साहित्यकारों की उल्लेखनीय सहभागिता रही।

डॉ. मीनकेतन प्रधान के संचालन ने बांधा समां

विश्व हिन्दी अधिष्ठान के संस्थापक-संचालक डॉ. मीनकेतन प्रधान ने अपने ओजस्वी एवं प्रभावशाली संचालन से पूरे आयोजन को विशेष गरिमा प्रदान की। प्रतिभागियों के आग्रह पर उन्होंने अपनी नवीन रचनाओं का भी पाठ किया।

रायगढ़ से दुनिया तक पहुंचा भारतीय ज्ञान का संदेश

ज्ञान, संस्कृति, साहित्य और वैश्विक संवाद का यह आयोजन भारतीय ज्ञान परंपरा की सार्वभौमिकता को रेखांकित करते हुए रायगढ़ को एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय साहित्यिक मानचित्र पर स्थापित करने में सफल रहा। देश-विदेश के विद्वानों ने इसे भारतीय संस्कृति और हिंदी भाषा के वैश्विक विस्तार की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल बताया।

 

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