RTI की धज्जियाँ उड़ा रहे बिलासपुर आदिवासी विभाग के सहायक आयुक्त संजय चंदेल! एक ही तरह की जानकारी पर दो अलग-अलग जवाब, अधिकारी कटघरे में

RTI की धज्जियाँ उड़ा रहे सहायक आयुक्त! धारा 8(1) ञ का गलत इस्तेमाल

बिलासपुर। बिलासपुर में आदिवासी विकास विभाग के सहायक आयुक्त संजय चन्देल एक बार फिर विवादों में घिर गए हैं। सूचना का अधिकार (RTI) के तहत मांगी गई एक जैसी जानकारी पर दो अलग-अलग जवाब देकर उन्होंने न सिर्फ पारदर्शिता पर सवाल खड़े किए हैं, बल्कि कानून की मंशा को भी कठघरे में ला खड़ा किया है।

RTI कार्यकर्ता द्वारा सहायक ग्रेड-3 संजय शुक्ला के प्रथम नियुक्ति आदेश की प्रति मांगे जाने पर विभाग ने एक पेज की जानकारी दे दी। वहीं, विवादित कनिष्ठ लेखाधिकारी पवन शर्मा के मामले में इसी तरह की जानकारी को सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 की धारा 8(1)ञ (व्यक्तिगत जानकारी) का हवाला देते हुए देने से मना कर दिया गया।

विशेषज्ञों के अनुसार, सरकारी कर्मचारी की नियुक्ति से जुड़ी जानकारी सार्वजनिक रिकॉर्ड होती है और इसे व्यक्तिगत जानकारी बताकर रोकना कानून का गलत उपयोग माना जाता है।

RTI के तहत क्या हो सकती है कार्रवाई?

सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 के प्रावधानों के अनुसार ऐसे मामलों में सख्त कार्रवाई का प्रावधान है—

🔴 धारा 20(1):
यदि लोक सूचना अधिकारी (PIO) बिना उचित कारण के जानकारी देने से मना करता है या गलत/भ्रामक जानकारी देता है, तो उस पर ₹250 प्रतिदिन के हिसाब से अधिकतम ₹25,000 तक जुर्माना लगाया जा सकता है।

🔴 धारा 20(2):
लगातार लापरवाही या नियमों की अवहेलना पर संबंधित अधिकारी के खिलाफ विभागीय कार्रवाई (Disciplinary Action) की सिफारिश की जा सकती है।

🔴 धारा 19(1):
आवेदक ऐसे मामलों में प्रथम अपील कर सकता है, जिससे मामला उच्च अधिकारी तक पहुंचता है।

🔴 धारा 18:
सूचना आयोग में शिकायत (Complaint) भी दर्ज की जा सकती है, जहां सीधे जांच कर कार्रवाई की जा सकती है।

प्रथम अपील के लिए मजबूर हो रहे आवेदक

इस तरह के विरोधाभासी जवाबों से आवेदकों को मजबूरी में प्रथम अपील करनी पड़ रही है, जिससे उनका समय और अतिरिक्त शुल्क (₹50) खर्च हो रहा है। साथ ही, प्रथम अपीलीय अधिकारी का कार्यभार भी अनावश्यक रूप से बढ़ रहा है।

कटघरे में सहायक आयुक्त

सहायक आयुक्त संजय चन्देल की कार्यप्रणाली अब गंभीर सवालों के घेरे में है। एक ही प्रकार की जानकारी पर अलग-अलग निर्णय लेना न केवल नियमों की अनदेखी है, बल्कि यह शासन की छवि को भी नुकसान पहुंचा रहा है।

RTI कार्यकर्ताओं का कहना है कि यदि ऐसे अधिकारियों पर समय रहते कार्रवाई नहीं की गई, तो सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 का उद्देश्य ही कमजोर पड़ जाएगा और आम जनता का भरोसा व्यवस्था से उठ सकता है।

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