बिलासपुर: “लास्ट टाइम” शब्द को लेकर RTI आवेदन खारिज, DEO अनिल तिवारी ने RTI अधिनियम की धारा का दिया गलत हवाला

“लास्ट टाइम” शब्द को लेकर RTI आवेदन खारिज: क्या DEO अनिल तिवारी जैसे अधिकारी अपनी जवाबदेही खो रहे हैं?

धारा 2(च) और 2(ञ) धाराएँ “पब्लिक अथॉरिटी” और “रिकॉर्ड” की परिभाषा से संबंधित हैं, न कि सूचना को खारिज करने के आधार से

बिलासपुर | सूचना के अधिकार (RTI) के तहत एक आवेदन को खारिज कर दिया गया है; क्योंकि इसमें इस्तेमाल किया गया “लास्ट टाइम” शब्द विभाग के लिए “स्पष्ट नहीं” था! हां, आपने सही पढ़ा। जिला शिक्षा अधिकारी कार्यालय ने यूथ एंड इको क्लब के लिए “लास्ट टाइम” आए  बजट की जानकारी मांगने वाले RTI आवेदन को यह कहते हुए अस्वीकार कर दिया कि “लास्ट टाइम” शब्द अधिनियम की धारा 2(च) और 2(ञ) के अंतर्गत स्पष्ट नहीं है।

जानकारों ने यह भी बताया कि जिस धारा 2(च) और 2(ञ) का हवाला देकर आवेदन निरस्त किया गया, वे धाराएँ “पब्लिक अथॉरिटी” और “रिकॉर्ड” की परिभाषा से संबंधित हैं, न कि सूचना को खारिज करने के आधार से।

आवेदन में, यूथ एंड इको क्लब के लिए “लास्ट टाइम” प्राप्त बजट की प्रमाणित छायाप्रति मांगी गई थी, जिसे जनसूचना अधिकारी ने केवल शब्दों की तकनीकी व्याख्या के आधार पर खारिज कर दिया। इस जवाब ने एक बड़ा सवाल खड़ा किया है कि क्या सरकारी कार्यालयों में सूचना का अधिकार लेने वाले नागरिकों के सवालों को इस तरह से खारिज किया जा सकता है?

RTI विशेषज्ञों के मुताबिक, “लास्ट टाइम” शब्द में कोई विशेष अस्पष्टता नहीं है और इसका सामान्य अर्थ “सबसे हालिया बजट” होता है। विशेषज्ञों ने इस जवाब को “गलत व्याख्या” बताते हुए कहा कि यदि अधिकारी को शब्दों को लेकर कोई शंका होती, तो उन्हें स्पष्टीकरण मांगने का अधिकार था, न कि आवेदन को बिना उत्तर दिए खारिज कर देना।

सवाल यह है: क्या सरकारी अधिकारियों को इस तरह से जनता के सवालों को तकनीकी आधार पर खारिज करने का अधिकार है? क्या यह RTI अधिनियम के मूल उद्देश्य, जो पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करता है, के खिलाफ नहीं जाता?

सूचना के अधिकार (RTI) अधिनियम को पारदर्शिता और जवाबदेही का प्रतीक माना जाता है। यह कानून नागरिकों को यह अधिकार प्रदान करता है कि वे सरकारी दफ्तरों से महत्वपूर्ण जानकारी प्राप्त कर सकें, ताकि प्रशासनिक प्रक्रियाओं में पारदर्शिता बनी रहे।

यह निर्णय न केवल एक तकनीकी खामी की ओर इशारा करता है, बल्कि यह उस दुरवस्था को भी उजागर करता है, जो हमारे सरकारी संस्थानों में आमतौर पर देखने को मिलती है। क्या हमें अब शब्दों के खेल में उलझकर अपने नागरिकों के कानूनी अधिकारों को नकारने की अनुमति देनी चाहिए? क्या यह पारदर्शिता और जवाबदेही के खिलाफ नहीं है?

अगर सरकारी अधिकारी अपनी अधिकारिता का उपयोग इस तरह से करेंगे, तो इससे न केवल नागरिकों का विश्वास टूटेगा, बल्कि RTI अधिनियम की सकारात्मकता और उद्देश्य पर भी प्रश्नचिन्ह लग जाएगा। RTI का उद्देश्य है सूचना का खुलासा करना और नागरिकों को यह अधिकार देना कि वे सरकारी कार्यों में गड़बड़ी का पता लगा सकें। अगर आवेदन में सिर्फ शब्दों की अस्पष्टता के कारण सूचना देने से मना कर दिया जाता है, तो इसका मतलब है कि हम अपने प्रशासनिक ढांचे को बेमानी बना रहे हैं।

अगर हमें सूचना प्राप्त करने के अधिकार का पूर्णत: सम्मान करना है, तो हमें यह समझना होगा कि एक शब्द को लेकर इतना बड़ा निर्णय देना अत्यधिक अव्यावहारिक है। RTI अधिनियम में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि जब सूचना उपलब्ध हो, तो उसे देने का कर्तव्य सरकारी प्राधिकरण का है, भले ही आवेदन में कुछ अस्पष्टता हो। आवेदक के लिए यह काफी स्पष्ट था कि वह पिछले बजट के बारे में जानकारी प्राप्त करना चाहता था, और अगर अधिकारियों को कुछ और चाहिए था, तो उन्हें स्पष्टीकरण मांगने का विकल्प था, न कि आवेदन को खारिज करने का।

यह मामला केवल एक शब्द के चयन पर आधारित नहीं है; यह उन कठिनाइयों और संकटों को भी उजागर करता है, जो RTI आवेदन प्रक्रिया में नागरिकों के सामने आती हैं। यह हमारे सरकारी सिस्टम की जवाबदेही और पारदर्शिता पर एक गंभीर सवाल खड़ा करता है, और यह हमें यह सोचने पर मजबूर करता है कि क्या हम वाकई में अपने नागरिकों को अधिकार देने के लिए तैयार हैं या हम उनकी कोशिशों को रोकने का हर मौका ढूंढते रहेंगे।

यह मामला सिर्फ एक आवेदन का नहीं है, बल्कि पूरे सिस्टम की कार्यप्रणाली पर एक कठोर परीक्षा है।

क्या “लास्ट टाइम” शब्द के कारण RTI के अधिकारों की हत्या हो रही है?
यह सवाल अब सभी नागरिकों के सामने खड़ा हो गया है।

  • पंकज खण्डेलवाल

    Pankaj Khandelwal is the Founder & Principal Editor of News Hub Insight (NHI). He is an independent journalist with expertise in governance, education, public policy, civic issues and investigative reporting. His reporting is based on accuracy, public interest and responsible journalism. Every article published under his editorial supervision follows News Hub Insight's Editorial Policy, Fact Check Policy and Correction Policy.

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