बैल हुए बेरोजगार

लेखिका
रश्मि रामेश्वर गुप्ता

अगर मैं ये कहूं कि हमारे बैल बेरोजगार हो गए हैं तो हो सकता है आपको मेरी यह बात बुरी लगे परंतु यह आज का कटु सत्य है। हमारी गौ माता तो सड़कों पर बैठ ही रही है परंतु हमारे बैल अनाथों की भांति इधर-उधर घूम रहे हैं ,जैसे उन्हें किसी ने नौकरी से निकाल दिया हो ।

एक जमाना था जब बैलों के घंटी की आवाज जब सुनाई पड़ती थी तो मन में उत्सुकता जागृत हो जाती थी । जब हम छोटे थे तब बैलगाड़ी में बैठकर मंदिरों की नगरी आरंग के एक मैदान में रावण मारने जाया करते थे।

उस जमाने में खेतों में जब बेलन चलता था तो बैलों का प्रयोग किया जाता था और बेलन में बैठने का अपना आनंद हुआ करता था। बचपन में पोरा त्यौहार के दिन जब हम मिट्टी के बैल की पूजा करते थे तो वास्तव में अपने घर के बाहर सजे हुए बैलों को दौड़ते हुए भी देखा करते थे ।

आज भी पोरा का हम त्यौहार मनाते हैं । बाजारों में आज भी मिट्टी के सजे हुए बैल बिकते हुए देखे जा सकते हैं परंतु वास्तव में हमारे बैलों की क्या स्थिति हो गई यह किसी से छुपी नहीं है गांव के सुदूर अंचलों में बैलों का उपयोग कृषि कार्य में किया जाता होगा परंतु दूर-दूर तक ट्रैक्टर आदि मशीनों ने इन बैलों की जगह ले रखी है । आखिर हमारे बैल जाएं तो जाएं कहां ? हम कितनी दिखावटी और नकली जीवन जी रहे हैं।

जब हम उत्तराखंड की यात्रा पर गए थे तो हमने देखा की 25 – 26 किलोमीटर की ट्रैकिंग आसान नहीं थी। ऐसे रास्ते पर घोड़े और खच्चरों की भरमार थी। ऐसा लग रहा था जैसे मनुष्य कम और घोड़े खच्चरों की संख्या ज्यादा थी। कोई प्रदूषण नहीं ,कोई पेट्रोल डीजल का धुंआ नहीं, कोई हॉर्न नहीं। प्राकृतिक वातावरण इतना सुरम्य बना हुआ था शायद इसलिए कि वहां धूल और धुएं का घेरा नहीं था परंतु जिस जगह मनुष्य गाड़ियों का प्रयोग कर हे थे वहां से कचरा बिखरना धूल और धुएं का गुब्बार शुरू हो जा रहा था। हमने देखा जीवनोंपयोगी अधिकाधिक सामान पहाड़ों पर घोड़े खच्चरों की मदद से चढ़ाए जा रहे थे। मन में यह ख्याल आ रहा था कि पहाड़ों पर घोड़े और खच्चरों को तो रोजगार मिल गया परंतु हमारे बैल जो मैदानी भू भाग में हैं शायद बेरोजगार हो गए।

कभी बैल किसानों के साथी थे अब बैल किसानों से दूर हो गए, खेतों से दूर हो गए, घर से दूर हो गए। अब वे अपनी मूक भाषा में पूछते हैं आखिर हम जाएं तो जाएं कहां ?

हम पशुधन के साथ जो अन्याय कर रहे हैं प्रकृति हमसे इस बात का भी बदला लेती है । हमारे पूर्वजों ने अपनी संस्कृति को पूर्ण निष्ठा के साथ निभाया, मनाया। अब हमारे अंदर कितनी निष्ठा बची है ये यक्ष प्रश्न है ….

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