बिलासपुर। शब्द जब साधना बन जाएं और गीत आत्मा की आवाज बनकर गूंजें, तो वह केवल पुस्तक नहीं—एक विचारधारा बन जाती है। ऐसा ही दृश्य देखने को मिला जब सुविख्यात गीतकार बुधराम यादव की नौवीं कृति “गीत मुक्ति का प्रथम प्रणव” का भव्य लोकार्पण 3 मई को शहर के लखीराम ऑडिटोरियम में हुआ।
यह आयोजन भारतेंदु साहित्य समिति के तत्वावधान में संपन्न हुआ, जहां साहित्य, संस्कृति और संवेदना का अद्भुत संगम देखने को मिला।
जब शब्दों ने बांधा समां
कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में राष्ट्रीय स्तर के गीतकार ईश्वरी यादव उपस्थित रहे, जबकि अध्यक्षता शिक्षाविद् डॉ. विनय कुमार पाठक ने की।
विशिष्ट अतिथियों में विजय राठौर, देवधर दास महंत, शहरयार खान (सिवना प्रकाशन, सीहोर) सहित कई साहित्यिक हस्तियां शामिल रहीं।
कार्यक्रम की शुरुआत मां सरस्वती की पूजा-अर्चना एवं अतिथियों के शाल-श्रीफल से सम्मान के साथ हुई। वरिष्ठ साहित्यकार विजय कल्याणी तिवारी ने स्वागत उद्बोधन देकर माहौल को साहित्यिक ऊंचाई दी।
गीत—सरल पढ़ना, कठिन लिखना
अपने विचार रखते हुए विजय राठौर ने कहा—
“गीत पढ़ने में जितना सरल लगता है, लिखने में उतना ही कठिन होता है।”
वहीं देवधर महंत ने कृति की गहन समीक्षा करते हुए इसके भाव और शिल्प को सराहा।
जब कवि ने खुद सुनाए अपने गीत
मुख्य अतिथि ईश्वरी यादव ने संग्रह के गीतों का पाठ करते हुए उनके शब्द विन्यास, कथ्य और शिल्प का प्रभावशाली विश्लेषण किया।
अध्यक्षीय उद्बोधन में डॉ. विनय पाठक ने छंद और गीत की परंपरा पर विस्तृत व्याख्यान देकर कार्यक्रम को बौद्धिक ऊंचाई प्रदान की।
वहीं रचनाकार बुधराम यादव ने अपने अनुभव साझा करते हुए जब स्वयं अपने गीतों का पाठ किया, तो पूरा सभागार भावनाओं से सराबोर हो उठा।
सम्मान और सराहना का सिलसिला
इस अवसर पर
-भारतेंदु साहित्य समिति
-बिलासा कला मंच
-अरपा साहित्य समिति
-संस्कार भारती
-यादव समाज
सहित विभिन्न संस्थाओं ने रचनाकार का सम्मान किया।
संगीत से सजी समापन प्रस्तुति
कार्यक्रम के अंतिम चरण में पूर्व प्राध्यापक डॉ. चितरंजन कर ने यादव जी के गीतों की संगीतमय प्रस्तुति देकर माहौल को और भी भावपूर्ण बना दिया।
साहित्य प्रेमियों की रही बड़ी उपस्थिति
कार्यक्रम में अमृत लाल पाठक, हूप सिंह क्षत्री, रेख राम साहू, ओम प्रकाश भट्ट, राकेश पांडेय, मयंक दुबे, दिनेश रोहित चतुर्वेदी, देवेश गोपाल, नरेंद्र शुक्ल, द्रौपदी साहू, मनीषा भट्ट, पूर्णिमा तिवारी सहित बड़ी संख्या में साहित्य प्रेमी, परिवारजन एवं गणमान्य नागरिक उपस्थित रहे।
“जब गीत सिर्फ शब्द नहीं, बल्कि समाज और संवेदना की आवाज बन जाएं—तभी साहित्य अपनी असली भूमिका निभाता है… ‘गीत मुक्ति का प्रथम प्रणव’ उसी दिशा में एक सशक्त कदम है।”















