सारंगढ़ (छत्तीसगढ़): छत्तीसगढ़ राज्य स्थापना दिवस के अवसर पर जिला प्रशासन द्वारा जिला सारंगढ़-बिलाईगढ़ में आयोजित भव्य राज्योत्सव 2026 का मंच स्थानीय कला और संस्कृति की चमक से सराबोर नजर आया। इस प्रतिष्ठित आयोजन में ‘माँ वैष्णवी संगीत महाविद्यालय, रानीसागर, सारंगढ़’ की प्रतिभाशाली छात्राओं और कलाकारों ने अपनी एक से बढ़कर एक शानदार सांस्कृतिक प्रस्तुतियों से पूरे समारोह में चार चांद लगा दिए।
अतिथियों की गरिमामयी उपस्थिति
इस भव्य समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में सांसद राधेश्याम राठिया, वरिष्ठ नेता जगन्नाथ पाणिग्रही सहित क्षेत्र के कई वरिष्ठ जनप्रतिनिधि और जिला कलेक्टर महोदया विशेष रूप से उपस्थित रहीं। सभी अतिथियों ने कलाकारों की कला साधना की मुक्त कंठ से सराहना की।
समूह कथक नृत्य में नर्तकियों का अद्भुत जादू

कार्यक्रम का मुख्य आकर्षण महाविद्यालय की छात्राओं द्वारा प्रस्तुत रायगढ़ घराने की पारंपरिक कथक नृत्य शैली रही। समूह प्रस्तुति के दौरान नर्तकियों की भावपूर्ण भाव-भंगिमाओं, सधी हुई लयकारी, शानदार पद संचालन (Footwork) और आकर्षक नृत्य संयोजन ने उपस्थित दर्शकों और अतिथियों को पूरी तरह मंत्रमुग्ध कर दिया। इस मनमोहक समूह कथक में राष्ट्रीय कथक नृत्यांगना यामी वैष्णव, पूर्वी भगत, अदिति सुल्तानिया एवं एम्मा श्रुति कुजूर ने अपनी कला का उत्कृष्ट प्रदर्शन किया। इसके साथ ही, महाविद्यालय की छात्रा अपेक्षा केशवानी और अनुषा केसरवानी ने अपने शानदार एकल कथक नृत्य (Solo Kathak) से दर्शक दीर्घा की भरपूर तालियां बटोरीं।
सितार और तबले की जुगलबंदी ने बांधा समां
नृत्य के अलावा सांगीतिक प्रस्तुतियों ने भी समारोह में विशेष रंग जमाया। माँ वैष्णवी संगीत महाविद्यालय के प्राचार्य एल. डी. वैष्णव ने अपने जादुई हाथों से सितार वादन किया, जबकि बजरंग चौहान ने तबले पर बेहतरीन संगत दी। सितार के मधुर सुरों और तबले की थाप की इस शानदार जुगलबंदी ने पूरे वातावरण को पूरी तरह संगीतमय और ऊर्जावान बना दिया।
कला और संस्कृति का अनूठा संगम
इस अवसर पर महाविद्यालय परिवार ने जिला प्रशासन, सारंगढ़-बिलाईगढ़ का हृदय से आभार व्यक्त किया कि उन्होंने स्थानीय कलाकारों को राज्योत्सव जैसे बड़े मंच पर अपनी कला और सांस्कृतिक विरासत को प्रदर्शित करने का सुनहरा अवसर दिया।
यह आयोजन न केवल कलाकारों के लिए गौरव का क्षण रहा, बल्कि छत्तीसगढ़ की माटी और रायगढ़ कथक घराने की समृद्ध परंपरा को जन-जन तक पहुंचाने की दिशा में एक ऐतिहासिक मील का पत्थर साबित हुआ है।







