डॉ. शगुफ्ता परवीन – सुरेंद्र वर्मा, बिलासपुर
आज जब किन्नर समुदाय मुख्यधारा में अपनी सशक्त पहचान बना रहा है, तब गुरु पूर्णिमा का पर्व केवल परंपरा निभाने का अवसर नहीं, बल्कि नई पीढ़ी को सशक्त बनाने, शिक्षा से जोड़ने और समाज में सम्मानजनक स्थान दिलाने का भी माध्यम है। यह दिन हमें याद दिलाता है कि गुरु वह दीपक है, जो अंधकार में मार्ग दिखाता है और शिष्य वह पुष्प है, जो गुरु की छत्रछाया में खिलता और महकता है।
गुरु पूर्णिमा के इस पावन अवसर पर हम दुआ करते हैं कि प्रत्येक किन्नर भाई-बहन को ऐसा गुरु मिले, जो उनके जीवन को ज्ञान, आत्मविश्वास और उजाले से भर दे। गुरु-शिष्य का यह पवित्र संबंध सदैव अटूट रहे, समुदाय निरंतर प्रगति करे और पूरा समाज समावेशिता, प्रेम तथा इंसानियत की मिसाल कायम करे।
जब-जब इल्म, अदब, तहज़ीब और रूहानी रहनुमाई का ज़िक्र होता है, तब-तब सबसे पहले गुरु, मुर्शिद, उस्ताद और रहनुमा का ख़याल मन में आता है। भारतीय संस्कृति में गुरु को वह सर्वोच्च स्थान प्राप्त है, जो मनुष्य को अज्ञान के अंधकार से निकालकर ज्ञान और प्रकाश की ओर ले जाता है। इसी महान परंपरा के सम्मान में प्रत्येक वर्ष आषाढ़ पूर्णिमा के दिन गुरु पूर्णिमा मनाई जाती है।
हमारी संस्कृति में गुरु पूर्णिमा केवल एक धार्मिक अथवा आध्यात्मिक उत्सव नहीं, बल्कि गुरु के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का भी पावन दिवस है। इस अवसर पर प्रत्येक शिष्य अपने गुरु के प्रति श्रद्धा, सम्मान और प्रेम का भाव प्रकट करता है। यही परंपरा किन्नर समुदाय में भी सदियों से अत्यंत सम्मान और गरिमा के साथ निभाई जाती रही है।
किन्नर समाज की सामाजिक संरचना गुरु-चेला परंपरा पर आधारित है। किसी भी नए सदस्य की पहचान, रहन-सहन के तौर-तरीके, अनुशासन, जीवन जीने की कला तथा सामाजिक व्यवहार की शिक्षा उसे अपने गुरु या उस्ताद से ही प्राप्त होती है। इसलिए किन्नर समाज में गुरु केवल शिक्षक नहीं, बल्कि संरक्षक, मार्गदर्शक और परिवार के मुखिया के रूप में सम्मानित होते हैं।
गुरु पूर्णिमा के दिन किन्नर समुदाय के सदस्य अपने गुरु का तिलक, चरण-पूजन, आरती और वंदना करते हैं। साथ ही अपनी सामर्थ्य के अनुसार नए वस्त्र, फल, मिठाइयाँ तथा अन्य उपहार भेंट कर अपनी श्रद्धा व्यक्त करते हैं। शिष्य अपने गुरु से आशीर्वाद प्राप्त कर अपने जीवन में सुख, शांति, समृद्धि और सफलता की कामना करते हैं।
इस अवसर पर अनेक अखाड़ों और डेरों में भजन-कीर्तन, मंगलगीत, सांस्कृतिक कार्यक्रम तथा सामूहिक भोज का आयोजन किया जाता है। गुरुजन भी अपने शिष्यों को समाज की मर्यादा, इंसानियत, सेवा-भाव, धैर्य, अनुशासन और आपसी सौहार्द बनाए रखने का संदेश देते हैं। कई स्थानों पर समुदाय की शिक्षा, स्वास्थ्य, स्वरोजगार और सामाजिक जागरूकता जैसे विषयों पर भी विचार-विमर्श किया जाता है।
किन्नर समुदाय का विश्वास है कि गुरु वह व्यक्तित्व है, जो जीवन के कठिन समय में अपने शिष्य का मनोबल बढ़ाता है, उसे संघर्षों से लड़ना सिखाता है और जीवन का उद्देश्य समझाता है। समाज द्वारा उपेक्षित परिस्थितियों में भी गुरु अपने शिष्य का सबसे बड़ा सहारा बनता है। इसलिए गुरु पूर्णिमा किन्नर समुदाय के लिए केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि रिश्तों की पवित्रता, निष्ठा और कृतज्ञता का उत्सव भी है।
यदि भारत की विविधता और समावेशी परंपराओं पर दृष्टि डालें तो इस्लाम, पारसी तथा सूफी परंपरा में भी उस्ताद, आलिम, शेख, पीर और मुर्शिद का अत्यंत सम्मान किया जाता है। कुरआन और हदीस की शिक्षा देने वाले विद्वानों का आदर करना नेक अमल माना गया है। सूफी परंपरा में मुर्शिद और मुरीद का संबंध आध्यात्मिक मार्गदर्शन का आधार माना जाता है। देश के लगभग सभी धर्मों और समुदायों में गुरु अथवा मार्गदर्शक के प्रति सम्मान की परंपरा किसी न किसी रूप में विद्यमान है, भले ही उनके उत्सव और परंपराएँ अलग-अलग हों।
आज के समय में दुर्भाग्य से अनेक लोगों के लिए “गुरु” केवल दो अक्षरों का एक शब्द बनकर रह गया है। हम धीरे-धीरे गुरु के वास्तविक अर्थ और महत्त्व को भूलते जा रहे हैं। सामान्य धारणा है कि गुरु का कार्य केवल ज्ञान देना, उपदेश करना या धार्मिक अनुष्ठान कराना है, जबकि वास्तविकता इससे कहीं अधिक व्यापक है।
गुरु वह होता है, जो हमारे सामने उन नए आयामों को खोलता है, जिन्हें हम अपने सीमित अनुभवों, इंद्रिय-बोध और मानसिक धारणाओं के कारण नहीं देख पाते। गुरु का वास्तविक उद्देश्य हमें हमारे अस्तित्व की गहराई से परिचित कराना और आत्मपरिवर्तन की दिशा में प्रेरित करना है।
गुरु जीवन-यात्रा की मंज़िल नहीं, बल्कि उस मंज़िल तक पहुँचने का मार्ग है। जैसे किसी अनजान रास्ते पर सही दिशा पाने के लिए रोडमैप या जीपीएस की आवश्यकता होती है, उसी प्रकार जीवन में गुरु एक जीवंत मार्गदर्शक की भूमिका निभाता है। वह हमें सही दिशा, सही दृष्टि और सही निर्णय लेने की प्रेरणा देता है।
इसीलिए गुरु पूर्णिमा केवल श्रद्धा का पर्व नहीं, बल्कि आत्ममंथन, कृतज्ञता और जीवन को सही दिशा देने वाले गुरु के प्रति सम्मान व्यक्त करने का पावन अवसर है।
(फोटो सौजन्य : टोपेश चंद्रा)







