बिलासपुर: विपक्ष में रहकर सरकार का विरोध करना लोकतंत्र की आत्मा है। सड़क से सदन तक आवाज़ उठाना हर राजनीतिक दल का अधिकार भी है और कर्तव्य भी। लेकिन जब यही सवाल सत्ता में रहते हुए अनसुने रह जाएं, तब विरोध की विश्वसनीयता पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
बिलासपुर के अपोलो चौक, वार्ड नंबर–52 में पिछले 37 दिनों से चल रहे धरना आंदोलन में पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव भूपेश बघेल की मौजूदगी ने एक बार फिर राजनीतिक बहस को तेज कर दिया है। पट्टाधारी गरीबों के मकान तोड़े जाने का विरोध मानवीय है, लेकिन जनता यह पूछने को मजबूर है कि जब भूपेश बघेल स्वयं मुख्यमंत्री थे और इसी इलाके का सर्वे उसी समय नगर निगम ने किया था, तब इस योजना को बदला क्यों नहीं गया?
पांच साल की सत्ता में फैसले लेने की पूरी ताकत थी। फाइलें बदल सकती थीं, योजनाएं रोकी जा सकती थीं, गरीबों के पक्ष में स्पष्ट आदेश दिए जा सकते थे। लेकिन तब चुप्पी रही और आज सड़क पर संघर्ष दिखाई दे रहा है। यही चुप्पी आज विरोध को कठघरे में खड़ा कर रही है।
जनता आज किसी दल के पक्ष या विपक्ष में नहीं, बल्कि जवाब की तलाश में है। सवाल यह नहीं कि आज कौन विरोध कर रहा है, सवाल यह है कि तब फैसला क्यों नहीं लिया गया?
लोकतंत्र में याददाश्त बहुत तेज होती है। सत्ता में की गई चुप्पी, विपक्ष में दिए गए भाषणों से कहीं ज़्यादा भारी पड़ती है।
आज बिलासपुर यही कह रहा है—
विरोध का अधिकार है, लेकिन सत्ता में रहते जवाबदेही उससे भी बड़ी होती है।















