कलेक्टर संजय अग्रवाल जनता और पत्रकारों से सीधे संवाद में, आबकारी अधिकारी नवनीत तिवारी बोले— “7 तारीख के बाद मिलूंगा!” छत्तीसगढ़ प्रखर पत्रकार महासंघ में आक्रोश
ऑडिट की आड़ या जवाबों से दूरी? आबकारी अधिकारी नवनीत तिवारी पर उठे सवाल
कलेक्टर संजय अग्रवाल के पास हर दिन समय, आबकारी अधिकारी नवनीत तिवारी के पास 7 जुलाई के बाद!
कलेक्टर संजय अग्रवाल ऑन कॉल, आबकारी अधिकारी नवनीत तिवारी ऑन होल्ड!
बिलासपुर। एक ओर जिला कलेक्टर संजय अग्रवाल प्रतिदिन समीक्षा बैठकें लेकर प्रशासनिक कसावट ला रहे हैं। वे आम नागरिकों से सीधे संवाद कर रहे हैं, जनदर्शन में शिकायतें सुन रहे हैं, मैदानी दौरे कर रहे हैं, यहां तक कि फोन लगाकर लोगों से योजनाओं और शिकायतों की वास्तविक स्थिति भी जान रहे हैं। पत्रकारों द्वारा प्रकाशित समाचारों को भी गंभीरता से लेते हुए संबंधित मामलों में संज्ञान और चर्चा कर रहे हैं।
वहीं दूसरी ओर जिले के आबकारी अधिकारी नवनीत तिवारी का रवैया सवालों के घेरे में है। पत्रकारों द्वारा विभागीय जानकारी, कार्रवाई और जनहित से जुड़े मुद्दों पर चर्चा करने अथवा जानकारी लेने का प्रयास किया जाता है तो अक्सर “ऑडिट में व्यस्त हूं” का जवाब देकर मुलाकात टाल दी जाती है। सवाल यह उठता है कि यदि जिले का सर्वोच्च प्रशासनिक अधिकारी तमाम व्यस्तताओं के बावजूद जनता और मीडिया के लिए उपलब्ध है, तो क्या एक विभागीय अधिकारी के पास संवाद के लिए समय नहीं है?
सूत्रों का कहना है कि आबकारी विभाग से जुड़े कई महत्वपूर्ण मुद्दों और शिकायतों पर जानकारी लेने की कोशिशें लगातार की जा रही हैं, लेकिन संवाद का अभाव बना हुआ है। ऐसे में पारदर्शिता और जवाबदेही को लेकर भी प्रश्न खड़े हो रहे हैं।
लोकतांत्रिक व्यवस्था में मीडिया को शासन और जनता के बीच सेतु माना जाता है। यदि जनहित से जुड़े सवालों पर संवाद के दरवाजे बंद होने लगें, तो स्वाभाविक रूप से संदेह और चर्चाओं का बाजार गर्म होता है। आखिर ऐसा क्या है कि पत्रकारों से मिलने के लिए समय नहीं निकल पा रहा? क्या ऑडिट की व्यस्तता इतनी बड़ी है कि जनसंपर्क और जवाबदेही पीछे छूट जाए?
जिले में अब यह चर्चा तेज हो रही है कि जब कलेक्टर स्वयं जनता और मीडिया से सीधा संवाद स्थापित कर रहे हैं, तब विभागीय अधिकारियों को भी उसी पारदर्शिता और जवाबदेही की मिसाल पेश करनी चाहिए।















