बिलासपुर के सबसे बड़े शासकीय अस्पताल सिम्स के आसपास का यातायात वर्षों से शहर की सबसे गंभीर नागरिक समस्याओं में से एक रहा है। अस्पताल के मुख्य मार्ग पर अनियोजित पार्किंग, निजी एम्बुलेंसों की अव्यवस्थित कतारें, सड़क किनारे अतिक्रमण, ठेले-गुमटियां और दुकानों के सामने खड़े वाहन अक्सर ऐसी स्थिति पैदा कर देते हैं कि मरीजों से अधिक समय वाहन जाम में बिताते हैं। ऐसे में छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय के निर्देशों के अनुरूप आयोजित संयुक्त बैठक निश्चित रूप से स्वागत योग्य पहल है, लेकिन अब जनता को बैठकों और आश्वासनों से अधिक धरातल पर परिणाम चाहिए।
अस्पताल कोई सामान्य व्यावसायिक क्षेत्र नहीं होता। यहां हर मिनट की कीमत जीवन और मृत्यु के बीच का अंतर तय कर सकती है। यदि किसी गंभीर मरीज, गर्भवती महिला, हृदयाघात या सड़क दुर्घटना के घायल व्यक्ति की एम्बुलेंस जाम में फंस जाए, तो यह केवल यातायात की समस्या नहीं बल्कि प्रशासनिक असफलता मानी जाएगी। इसलिए सिम्स के आसपास यातायात व्यवस्था को केवल ट्रैफिक मैनेजमेंट का विषय नहीं, बल्कि “आपातकालीन स्वास्थ्य सेवा” का अभिन्न हिस्सा माना जाना चाहिए।
बैठक में पार्किंग का चिन्हांकन, निजी एम्बुलेंसों के लिए अलग पार्किंग, नो-पार्किंग जोन, अतिक्रमण नियंत्रण और नियमित निगरानी जैसे महत्वपूर्ण निर्णयों पर सहमति बनी है। यदि इन निर्णयों को समयबद्ध ढंग से लागू किया जाता है तो निश्चित ही सिम्स क्षेत्र की तस्वीर बदल सकती है। लेकिन अनुभव बताता है कि ऐसी योजनाएं अक्सर शुरुआती कार्रवाई के बाद शिथिल पड़ जाती हैं और कुछ महीनों में स्थिति फिर पहले जैसी हो जाती है।
सबसे बड़ी चुनौती अतिक्रमण हटाने की नहीं, बल्कि उसे दोबारा न होने देने की है। नगर निगम, यातायात पुलिस और सिम्स प्रबंधन को संयुक्त रूप से स्थायी निगरानी तंत्र विकसित करना होगा। अस्पताल परिसर के बाहर आधुनिक पार्किंग व्यवस्था, सीसीटीवी आधारित निगरानी, डिजिटल नो-पार्किंग प्रवर्तन, स्पष्ट संकेतक, पैदल यात्रियों के लिए सुरक्षित मार्ग और एम्बुलेंस कॉरिडोर जैसी व्यवस्थाएं अब समय की मांग हैं।
यह भी आवश्यक है कि निजी एम्बुलेंस संचालकों, दुकानदारों, ठेला संचालकों और स्थानीय नागरिकों को समाधान का सहभागी बनाया जाए। केवल दंडात्मक कार्रवाई से व्यवस्था लंबे समय तक नहीं टिकेगी। जागरूकता, वैकल्पिक स्थान और सख्त अनुपालन—इन तीनों का संतुलन ही स्थायी समाधान दे सकता है।
उच्च न्यायालय की सक्रियता ने प्रशासन को जिम्मेदारी निभाने का अवसर दिया है। अब यह अवसर परीक्षा में बदल चुका है। यदि इस बार भी योजनाएं केवल फाइलों और बैठकों तक सीमित रहीं, तो सबसे अधिक नुकसान उन मरीजों को होगा जिनकी हर सांस समय पर चिकित्सा मिलने पर निर्भर करती है।
सिम्स के बाहर जाम केवल ट्रैफिक नहीं, इंसानी जिंदगी का सवाल है।
अब प्रशासन को यह साबित करना होगा कि अस्पताल तक पहुंचने का रास्ता भी इलाज जितना ही महत्वपूर्ण है। जब एम्बुलेंस बिना रुके अस्पताल पहुंचेगी, तभी इस बैठक की वास्तविक सफलता मानी जाएगी।







