पत्रकार अड्डा से पत्रकारों के लिए ठंडे पानी की व्यवस्था हेतु रखा गया मटके का स्टैंड चोरी
बिलासपुर। नगर निगम के जोन-3 कार्यालय में इन दिनों “प्रवेश व्यवस्था” प्रशासनिक नियमों से नहीं, बल्कि कथित तौर पर अफसरों की मर्जी से संचालित होती दिखाई दे रही है। हालत यह है कि पिछले दो दिनों से कार्यालय का मेन गेट बंद पड़ा है, जबकि इसी परिसर में आवाजाही के लिए तीन बड़े गेट और एक छोटा गेट मौजूद हैं। इसके बावजूद जनता और कर्मचारियों को असुविधा झेलनी पड़ रही है।
जानकारी के मुताबिक, कार्यालय का पीछे वाला बड़ा गेट तो वर्षों से बंद पड़ा है। वहीं, एक बड़ा गेट और छोटा गेट ही वर्किंग टाइम में खोले जाते हैं। सबसे दिलचस्प स्थिति मेन गेट की है, जो किसी तय नियम या आदेश से नहीं, बल्कि “कभी खुला-कभी बंद” नीति पर चलता दिखाई देता है।
स्थानीय लोगों का कहना है कि “यह सरकारी कार्यालय है या किसी निजी फार्महाउस का गेट सिस्टम, समझना मुश्किल हो गया है।”
कार्यालय के भीतर भी इस व्यवस्था को लेकर नाराजगी है। एक दबंग कर्मचारी ने नाम न छापने की शर्त पर कहा कि
“हम खुद परेशान हैं। अपनी गाड़ी तक कार्यालय परिसर में नहीं रख पाते। अच्छा है गेट बंद है, कम से कम रोज की बहस तो नहीं होती।”
सूत्रों की मानें तो प्रभारी जोन कमिश्नर प्रवीण शुक्ला के इशारे पर मेन गेट को जब चाहो बंद और जब चाहो खोल दिया जाता है। सवाल यह उठ रहा है कि आखिर किसी सार्वजनिक कार्यालय के मुख्य प्रवेश द्वार के संचालन का कोई तय नियम है भी या नहीं?
मामले को और दिलचस्प बनाती है पार्किंग व्यवस्था। बताया जा रहा है कि वर्तमान वित्तीय वर्ष में अब तक कार्यालय परिसर के पार्किंग स्टैंड का टेंडर ही नहीं हुआ है। ऐसे में वाहन व्यवस्था भगवान भरोसे चल रही है।
लोग सवाल उठा रहे हैं कि जब पार्किंग का ठेका ही तय नहीं हुआ, तो गेट बंद कर वाहनों की एंट्री नियंत्रित करने का अधिकार किस आधार पर इस्तेमाल किया जा रहा है?
स्थानीय नागरिकों का कहना है कि निगम प्रशासन को यह स्पष्ट करना चाहिए कि —
- मेन गेट आखिर कब और किस आदेश पर बंद किया जाता है?
- वर्षों से पीछे का गेट बंद क्यों है?
- पार्किंग स्टैंड का टेंडर अब तक क्यों नहीं हुआ?
- और क्या सरकारी कार्यालयों की व्यवस्था अब “मर्जी मॉडल” पर चलेगी?
फिलहाल, जोन-3 कार्यालय का मेन गेट सिर्फ लोहे का दरवाजा नहीं, बल्कि निगम प्रशासन की कार्यशैली पर बड़ा सवाल बन चुका है।















