बिलासपुर नगर निगम में 14 लाख की कर वसूली गड़बड़ी: आरआई निलंबित, लेकिन सवाल—तीन साल तक सिस्टम सोता रहा?

तत्कालीन निगम आयुक्त अजय कुमार त्रिपाठी, कुणाल दुदावत व अमित कुमार के कार्यकाल में 14 लाख की टैक्स अनियमितता, इंटरनल ऑडिट ने खोली पोल

नगर निगम में राजस्व घोटाला: एक आरआई पर कार्रवाई, बाकी जिम्मेदार कौन?

क्या रामनारायण देवांगन सिर्फ मोहरा है? निगम के सिस्टम पर उठे सवाल

केवल आरआई को दोषी ठहराना प्रशासनिक सुविधा तो हो सकती है, पर न्याय नहीं

बिलासपुर। नगर निगम के जोन क्रमांक–2 में सामने आई ₹14.18 लाख की राजस्व कर अनियमितता ने निगम की पूरी राजस्व व्यवस्था को कठघरे में खड़ा कर दिया है। इंटरनल ऑडिट में खुलासा हुआ कि वित्तीय वर्ष 2022-23 से 2024-25 के बीच संपत्तिकर, समेकित कर और यूजर चार्ज की वसूली तो हुई, लेकिन यह राशि निकाय कोष तक पहुंची ही नहीं।

मामले में राजस्व निरीक्षक रामनारायण देवांगन को निलंबित कर दिया गया है, लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या तीन वर्षों तक चली यह गड़बड़ी केवल एक आरआई की जिम्मेदारी थी?

एक आरआई पर कार्रवाई, बाकी जिम्मेदार कौन?

तीन साल तक लगातार वसूली होने के बावजूद राशि जमा न होना यह संकेत देता है कि—

  • या तो निगरानी तंत्र पूरी तरह फेल था
  • या फिर ऊपरी स्तर पर मौन सहमति थी

यदि मासिक मिलान, लेखा परीक्षण और जोन स्तर की समीक्षा नियमित होती रही, तो ₹14 लाख की रकम आंखों से कैसे ओझल रही?

इंटरनल ऑडिट ने भले ही पोल खोल दी हो, लेकिन इससे पहले के ऑडिट आखिर क्या कर रहे थे?

उस समय कौन थे नगर निगम आयुक्त?

जिस अवधि में यह पूरी अनियमितता हुई, उस दौरान नगर निगम बिलासपुर में अलग-अलग समय पर तीन आयुक्त पदस्थ रहे—

  • अजय कुमार त्रिपाठी

  • कुणाल दुदावत

  • अमित कुमार

ऐसे में यह सवाल स्वाभाविक है कि—

क्या इन तीनों कार्यकालों में कभी भी राजस्व वसूली और जमा राशि का मिलान नहीं किया गया?

यदि किया गया था, तो गड़बड़ी क्यों नहीं पकड़ी गई?
और यदि नहीं किया गया, तो यह प्रशासनिक लापरवाही की गंभीर श्रेणी में आता है।

निलंबन काफी नहीं! FIR कब होगी?

निगम प्रशासन ने संकेत दिए हैं कि राशि जमा नहीं होने की स्थिति में एफआईआर दर्ज कराई जाएगी, लेकिन जानकारों का मानना है कि—

नागरिकों से वसूली गई राशि जानबूझकर जमा न करना केवल विभागीय लापरवाही नहीं, बल्कि आपराधिक विश्वासघात हो सकता है।

ऐसे मामलों में केवल निलंबन नहीं, बल्कि आपराधिक प्रकरण दर्ज होना अनिवार्य है।

क्या आरआई सिर्फ मोहरा है?

तीन वर्षों की अवधि में—

  • जोन प्रभारी
  • लेखा शाखा
  • सहायक/उपायुक्त स्तर के अधिकारी

इन सभी की भूमिका की जांच किए बिना यदि कार्रवाई सिर्फ एक कर्मचारी तक सीमित रहती है, तो यह “बलि का बकरा” तलाशने जैसी कार्रवाई मानी जाएगी।

 निलंबन से आगे की कार्रवाई कब?

₹14.18 लाख की यह गड़बड़ी केवल एक राशि नहीं, बल्कि नगर निगम की जवाबदेही और पारदर्शिता की परीक्षा है।
यदि कर वसूली हुई और कोष में जमा नहीं हुई, तो दोष तय करना केवल निचले स्तर पर नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम पर होना चाहिए।

आज सवाल यह नहीं है कि आरआई निलंबित हुआ या नहीं, सवाल यह है कि—

तीन साल तक सिस्टम क्यों चुप रहा?

कानूनी एंगल (यदि दोष सिद्ध हुआ)

  • छ.ग. सिविल सेवा (CCA) नियम 1966 – नियम 09(1)(ख)
    ➝ निलंबन वैधानिक
  • IPC की संभावित धाराएँ
    • धारा 409 – लोक सेवक द्वारा आपराधिक विश्वासघात
    • धारा 406 – गबन
    • धारा 420 – धोखाधड़ी

 इन मामलों में FIR अनिवार्य, केवल विभागीय कार्रवाई पर्याप्त नहीं।

 

  • पंकज खण्डेलवाल

    Pankaj Khandelwal is the Founder & Principal Editor of News Hub Insight (NHI). He is an independent journalist with expertise in governance, education, public policy, civic issues and investigative reporting. His reporting is based on accuracy, public interest and responsible journalism. Every article published under his editorial supervision follows News Hub Insight's Editorial Policy, Fact Check Policy and Correction Policy.

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