शिक्षा व्यवस्था की नींद कब टूटेगी? ब्रिलियंट स्कूल विवाद ने खोली सिस्टम की पोल
बिलासपुर के व्यापार विहार स्थित ब्रिलियंट पब्लिक स्कूल में कक्षा 5वीं और 8वीं के छात्रों को दोबारा बोर्ड परीक्षा दिलाने के कथित दबाव का मामला सिर्फ एक स्कूल की लापरवाही नहीं है, बल्कि यह पूरे शिक्षा तंत्र की सुस्त और बेपरवाह व्यवस्था का आईना बनकर सामने आया है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब बच्चे पहले ही परीक्षा दे चुके थे, तो आखिर अचानक दोबारा परीक्षा कराने की नौबत क्यों आई? क्या स्कूल प्रबंधन को पहले यह नहीं पता था कि परीक्षा किस बोर्ड या प्रक्रिया के तहत आयोजित होनी चाहिए? यदि स्कूल प्रबंधन की तरफ से कोई गड़बड़ी हुई है तो उसका खामियाजा मासूम बच्चों और अभिभावकों को क्यों भुगतना पड़े?
इस पूरे मामले ने एक और गंभीर सवाल खड़ा कर दिया है—जिला शिक्षा विभाग आखिर कर क्या रहा था?
नियमों के अनुसार जिला शिक्षा अधिकारी को समय-समय पर निजी स्कूलों का निरीक्षण कर यह सुनिश्चित करना होता है कि सभी संस्थान तय मानकों और मान्यता की शर्तों का पालन कर रहे हैं। यदि निरीक्षण और निगरानी की व्यवस्था सही ढंग से चल रही होती, तो आज यह विवाद शायद सामने ही नहीं आता।
दुर्भाग्य की बात यह है कि शिक्षा विभाग की सक्रियता तब दिखाई देती है जब मामला सड़कों और शिकायत पत्रों तक पहुंच जाता है। अगर अभिभावक आगे नहीं आते तो संभव है यह मामला दबा ही रह जाता और बच्चों का भविष्य दांव पर लगा रहता।
यह भी गंभीर विषय है कि जब विद्यालय की संबद्धता को लेकर सवाल उठे तो प्राचार्य स्पष्ट जवाब तक नहीं दे सके। आखिर यह कैसा संस्थान है जहां पढ़ाई तो हो रही है, लेकिन उसकी वैधता और परीक्षा प्रक्रिया ही सवालों के घेरे में है?
सरकार बार-बार “हर बच्चा पढ़े, हर बच्चा बढ़े” का नारा देती है, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि जिम्मेदार अधिकारी अपनी जिम्मेदारी निभाने में अक्सर नाकाम दिखाई देते हैं। शिक्षा जैसे संवेदनशील क्षेत्र में यह लापरवाही सीधे बच्चों के भविष्य से खिलवाड़ है।
अब सवाल सिर्फ एक स्कूल तक सीमित नहीं रह गया है। सवाल यह है कि क्या जिले के अन्य निजी स्कूलों की भी इसी तरह कभी गंभीरता से जांच की गई है? या फिर सब कुछ कागजों में ही चलता रहा है?
ऐसे में इस मामले की निष्पक्ष और त्वरित जांच बेहद जरूरी है। यदि स्कूल प्रबंधन की गलती सामने आती है तो उसके खिलाफ कड़ी कार्रवाई होनी चाहिए। साथ ही यह भी जांच होना चाहिए कि आखिर शिक्षा विभाग के स्तर पर निगरानी क्यों नहीं हुई और जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय क्यों न की जाए।
क्योंकि अगर सिस्टम की लापरवाही से बच्चों का साल खराब होता है, तो यह सिर्फ प्रशासनिक गलती नहीं बल्कि सामाजिक अपराध की श्रेणी में आता है।
अब समय आ गया है कि जिम्मेदारी तय हो।
अगर इस मामले में सख्त कार्रवाई नहीं हुई तो यह साफ संदेश जाएगा कि शिक्षा व्यवस्था में जवाबदेही नाम की कोई चीज नहीं बची है।
बिलासपुर की जनता और अभिभावक अब जवाब चाहते हैं—
आखिर बच्चों के भविष्य से खिलवाड़ करने वालों पर कार्रवाई कब होगी?















