बिलासपुर में शिक्षा विभाग की जवाबदेही पर सवाल: जिला शिक्षा अधिकारी का ‘RTI लगा लो’ जवाब, त्वरित पत्रकारिता के सामने खड़ी कर रहा दीवार!
राज्य स्तरीय शालेय क्रीड़ा प्रतियोगिता की गाइडलाइन और बजट पर नहीं मिला तत्काल जवाब; छत्तीसगढ़ प्रखर पत्रकार महासंघ मुख्यमंत्री के नाम सौंपेगा ज्ञापन
बिलासपुर। लोकतंत्र में मीडिया का काम केवल खबर प्रकाशित करना नहीं, बल्कि शासन-प्रशासन से सवाल पूछना और जनता तक तथ्यों को पहुंचाना भी है। लेकिन जब जिम्मेदार अधिकारी ही मीडिया के सवालों का तत्काल जवाब देने के बजाय ‘आरटीआई लगा लो’ कहकर अपनी जिम्मेदारी से किनारा करने लगें, तो प्रशासनिक पारदर्शिता और जवाबदेही पर सवाल उठना स्वाभाविक है। बिलासपुर के जिला शिक्षा अधिकारी संदीप कुमार पांडेय को लेकर न्यूज़ हब इनसाइट ने इसी सवाल को उठाया है—क्या जनहित से जुड़े हर सवाल का जवाब पाने के लिए पत्रकारों को 30 दिन तक इंतजार करना चाहिए?
खेल प्रतियोगिता की जानकारी मांगी, मिला RTI का रास्ता!
न्यूज़ हब इनसाइट की टीम ने जिला शिक्षा अधिकारी संदीप कुमार पांडेय से 7 से 10 अक्टूबर तक आयोजित राज्य स्तरीय शालेय क्रीड़ा प्रतियोगिता के संबंध में शासन से प्राप्त दिशा-निर्देशों, आयोजन के लिए स्वीकृत अथवा आवंटित राशि और संबंधित दस्तावेजों की जानकारी मांगी। टीम के अनुसार, अधिकारी ने तत्काल जानकारी उपलब्ध कराने के बजाय आरटीआई लगाने की सलाह दी।
यहां सवाल किसी अधिकारी से टकराव का नहीं, बल्कि उस व्यवस्था का है जिसमें मीडिया को समय पर तथ्य उपलब्ध होने चाहिए। प्रतियोगिता के आयोजन, सरकारी धन के उपयोग और शासन के दिशा-निर्देशों से जुड़ी जानकारी सार्वजनिक जवाबदेही के दायरे में आती है। यदि संबंधित दस्तावेज तत्काल उपलब्ध नहीं हैं, तो कम से कम अधिकारी अपनी आधिकारिक प्रतिक्रिया, उपलब्ध तथ्यों या जानकारी देने की समयसीमा के बारे में तो बता ही सकते हैं।
आरटीआई नागरिकों का कानूनी अधिकार है, लेकिन क्या यही मीडिया के हर तात्कालिक सवाल का एकमात्र जवाब होना चाहिए? यही वह बुनियादी सवाल है, जिसका जवाब शिक्षा विभाग को देना चाहिए।
खबर की समयसीमा बनाम सरकारी प्रक्रिया
पत्रकारिता में खबर की प्रासंगिकता समय से जुड़ी होती है। किसी आयोजन के दौरान उठे सवालों का जवाब यदि कई सप्ताह बाद मिले, तो उसका तत्काल समाचार-मूल्य प्रभावित हो सकता है। आरटीआई कानून के तहत सामान्यतः सूचना देने की समयसीमा आवेदन प्राप्त होने के 30 दिन तक हो सकती है, जबकि कुछ परिस्थितियों में अलग प्रावधान लागू होते हैं।
लेकिन हर मीडिया प्रश्न आरटीआई आवेदन नहीं होता। किसी जिम्मेदार अधिकारी से आधिकारिक पक्ष मांगना पत्रकारिता की सामान्य प्रक्रिया है। निष्पक्ष खबर के लिए संबंधित पक्ष का जवाब लेना जरूरी है, ताकि खबर में आरोप, तथ्य और प्रतिक्रिया के बीच स्पष्ट अंतर बना रहे।
ऐसे में सवाल उठता है कि क्या बिलासपुर का शिक्षा विभाग मीडिया के साथ संवाद की कोई प्रभावी व्यवस्था विकसित करेगा, या हर सवाल का जवाब केवल आरटीआई के माध्यम से ही दिया जाएगा?
छत्तीसगढ़ प्रखर पत्रकार महासंघ उठाएगा आवाज
मीडिया के साथ अधिकारियों के संवाद, जनहित के सवालों पर जवाबदेही और सूचना की उपलब्धता को लेकर छत्तीसगढ़ प्रखर पत्रकार महासंघ ने आवाज उठाने की तैयारी की है। संगठन की ओर से जिला कलेक्टर के माध्यम से मुख्यमंत्री के नाम ज्ञापन सौंपने की बात कही गई है।
ज्ञापन में जिला शिक्षा अधिकारी संदीप कुमार पांडेय सहित संबंधित अधिकारियों के मीडिया के प्रति रवैये, जनहित से जुड़े सवालों पर आधिकारिक प्रतिक्रिया देने की व्यवस्था और शासकीय आयोजनों से संबंधित सूचनाओं की पारदर्शिता के मुद्दे उठाए जाने की बात है।
संगठन का उद्देश्य किसी अधिकारी के विरुद्ध व्यक्तिगत अभियान चलाना नहीं, बल्कि पत्रकारों को तथ्य जुटाने में सहयोग देने और जनता से जुड़े मामलों में प्रशासनिक जवाबदेही सुनिश्चित करने की मांग करना होना चाहिए।
सबसे बड़ा सवाल: जवाबदेही से बचने का रास्ता या पारदर्शी प्रशासन?
सरकारी अधिकारी जनता के प्रति जवाबदेह होते हैं। पत्रकारों के हर सवाल का जवाब तत्काल देना हमेशा संभव नहीं हो सकता, लेकिन सवालों को सुनना, उपलब्ध तथ्य साझा करना और आधिकारिक पक्ष स्पष्ट करना प्रशासनिक जिम्मेदारी का हिस्सा है।
यदि किसी खबर में विभाग का पक्ष नहीं मिलता, तो खबर अधूरी रह सकती है। और यदि विभाग समय पर प्रतिक्रिया देने के बजाय केवल आरटीआई का रास्ता सुझाता है, तो जनता के सामने तथ्यों को समय रहते रखने की प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है।
अब निगाहें जिला प्रशासन और शिक्षा विभाग पर हैं—क्या मीडिया के सवालों का जवाब देने की व्यवस्था सुधरेगी? क्या राज्य स्तरीय शालेय क्रीड़ा प्रतियोगिता की गाइडलाइन और सरकारी राशि से संबंधित तथ्य सार्वजनिक होंगे? और क्या बहतराई स्टेडियम में विद्यार्थियों की सहभागिता से जुड़े सवालों पर संबंधित अधिकारी अपना पक्ष रखेंगे?
इन सवालों का जवाब किसी आरोप या राजनीतिक बयान से नहीं, बल्कि आधिकारिक दस्तावेजों, नियमों और जिम्मेदार अधिकारियों की स्पष्ट प्रतिक्रिया से सामने आना चाहिए।







