भाजपा के कार्यक्रम में क्यों झोंके गए 1600 छात्र? पत्र वायरल होने के बाद भी DEO संदीप पांडेय क्यों बचा रहे सहायक संचालक वर्षा शर्मा को?
सहायक संचालक वर्षा शर्मा का फरमान, DEO की खामोशी—क्या प्रशासनिक संरक्षण में हो रहा शिक्षा व्यवस्था का राजनीतिकरण?
बिलासपुर: जिला शिक्षा कार्यालय (DEO Office) में इन दिनों आम जनता की शिकायतों के साथ किस तरह का खिलवाड़ हो रहा है, इसकी एक बानगी हाल ही में सामने आई है। शिक्षा विभाग के दफ्तरों में सुशासन के दावों की धज्जियां कैसे उड़ रही हैं, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि 16 अक्टूबर को लगाई गई एक शिकायत आज भी संबंधित बाबू की टेबल पर धूल फांक रही है।
बाबू के पास वक्त नहीं, साहब अंजान!
जब हमारी टीम ने इस मामले की जमीनी हकीकत टटोली, तो चौंकाने वाले खुलासे हुए। पता चला कि शिकायतकर्ता का आवेदन पिछले 15 दिनों से केवल एक ही बाबू की टेबल पर दबा हुआ है। स्थिति यह है कि ऐसे ढेरों शिकायत पत्र उस बाबू के पास पेंडिंग पड़े हैं।
हैरानी की बात तो यह है कि जब इस बारे में सहायक संचालक बसंत प्रताप सिंह से अपडेट मांगा गया, तो वे पूरी तरह से अनभिज्ञ नजर आए। उन्होंने तुरंत अपने मातहत बाबू से पूछताछ की, तो रटा-रटाय जवाब मिला— “हम कोर्ट के मामलों में व्यस्त हैं।”
असली कसूरवार कौन? बाबू नहीं, डीईओ की ढिलाई
जानकारों का मानना है कि इसमें अकेले उस बाबू की गलती नहीं है, क्योंकि उस पर अन्य शाखाओं का भी अतिरिक्त कार्यभार है और वह काम के दबाव से उबर नहीं पा रहा है। इस पूरी व्यवस्थागत नाकामी के सीधे तौर पर जिम्मेदार नए जिला शिक्षा अधिकारी (DEO) संदीप पांडे हैं।
पुराना दौर: एक दिन में बैठती थी जांच टीम
स्थानीय लोगों और पुराने रिकॉर्ड्स की मानें तो संदीप पांडे के कार्यभार संभालने से पहले शिकायत शाखा की कार्यशैली बेहद चुस्त-दुरस्त थी।
- जिस दिन शिकायत मिलती थी, उसी दिन या अधिकतम अगले दिन जांच टीम गठित कर दी जाती थी।
- उस दौरान डॉ. सुनील यादव शिकायत शाखा की कमान संभालते थे, जो पारदर्शिता और त्वरित कार्रवाई के लिए जाने जाते थे।
- वर्तमान में इस शाखा की जिम्मेदारी हेमंत शर्मा के पास है, लेकिन डीईओ की उदासीनता के कारण पूरी व्यवस्था बेपटरी हो चुकी है।
मीडिया से दूरी और सरकार की किरकिरी
डीईओ संदीप पांडे का रवैया सिर्फ फाइलों के प्रति ही नहीं, बल्कि मीडिया के प्रति भी संदेहास्पद है। वे मीडिया को बाइट (बयान) देने से लगातार बचते नजर आते हैं। प्रशासनिक मोर्चे पर इस तरह की लापरवाही और जवाबदेही से बचने की आदत से शासन-प्रशासन की छवि पर सीधा बट्टा लग रहा है।
क्या उच्च अधिकारी इस मामले का संज्ञान लेंगे या शिक्षा विभाग में शिकायतों का यह दम घुटना यूं ही जारी रहेगा? यह एक बड़ा सवाल है।







