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बिलासपुर: शहर में लोग पेट्रोल पम्प पर सिर्फ पेट्रोल भरवाने नहीं जाते, वे वहां बुनियादी सुविधाओं की उम्मीद भी लेकर जाते हैं। लेकिन जब नगर निगम बिलासपुर के पेट्रोल पम्प में टायर में हवा भरने जैसी सामान्य सुविधा दो महीनों तक बंद मिले, तो मामला केवल एक मशीन खराब होने तक सीमित नहीं रहता। यह सीधे-सीधे प्रशासनिक निगरानी, जवाबदेही और उपभोक्ता अधिकारों पर सवाल खड़ा करता है।
सबसे बड़ा सवाल — आखिर दो महीने तक किसी ने देखा नहीं?
अगर कर्मचारियों की बात सही मानी जाए कि एयर मशीन करीब दो महीने से खराब है, तो इसका मतलब साफ है कि:
- या तो नियमित निरीक्षण नहीं हो रहा,
- या शिकायतों को गंभीरता से नहीं लिया जा रहा,
- या फिर जिम्मेदार अधिकारियों को इससे फर्क ही नहीं पड़ रहा।
नगर निगम का पेट्रोल पम्प कोई निजी ढाबा नहीं है, जहां “चलता है” संस्कृति पर काम हो। यह सार्वजनिक संस्था है, जहां जनता टैक्स और सेवाओं के भरोसे के साथ पहुंचती है।
“नंबर नहीं है” — यह जवाब सबसे खतरनाक संकेत
जब किसी जागरूक शख्स ने जिम्मेदार अधिकारी का नंबर मांगा और जवाब मिला “नंबर नहीं है”, तो यह केवल सूचना छुपाने का मामला नहीं लगता, बल्कि जवाबदेही से बचने की मानसिकता को दर्शाता है।
हर सार्वजनिक सेवा केंद्र में:
- प्रभारी अधिकारी का नाम,
- मोबाइल नंबर,
- शिकायत संपर्क,
- हेल्पलाइन
स्पष्ट रूप से प्रदर्शित होना चाहिए।
यदि यह जानकारी मौके पर उपलब्ध नहीं है, तो सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर पारदर्शिता किस स्तर पर लागू हो रही है?
शिकायत पुस्तिका भी औपचारिकता बनकर रह गई?
सबसे दिलचस्प और चिंताजनक हिस्सा वह है जहां शिकायत दर्ज तो कराई गई, लेकिन उसकी प्रति देने के बजाय कहा गया — “मोबाइल से फोटो खींच लो।”
यानी:
- शिकायत दर्ज करने की प्रक्रिया तो है,
- लेकिन शिकायत का प्रमाण देने की व्यवस्था नहीं।
यह स्थिति इसलिए गंभीर है क्योंकि कई बार शिकायत पुस्तिकाएं केवल दिखावे के लिए रखी जाती हैं। यदि शिकायतकर्ता को आधिकारिक प्रति ही न मिले, तो बाद में शिकायत के अस्तित्व से भी इनकार किया जा सकता है।
सवाल सिर्फ हवा का नहीं, सुरक्षा का भी है
टायर में सही हवा न होना सड़क सुरक्षा से जुड़ा विषय है। कम हवा वाले टायर:
- दुर्घटना का कारण बन सकते हैं,
- माइलेज कम करते हैं,
- टायर फटने का खतरा बढ़ाते हैं।
ऐसे में एयर सुविधा बंद होना केवल “सुविधा की कमी” नहीं बल्कि अप्रत्यक्ष रूप से सुरक्षा जोखिम भी है।
क्या नगर निगम के पास निगरानी तंत्र है?
यह मामला एक और बड़ा प्रश्न खड़ा करता है —
क्या नगर निगम अपने व्यावसायिक प्रतिष्ठानों की नियमित मॉनिटरिंग करता भी है?
यदि करता है, तो:
- निरीक्षण रिपोर्ट कहाँ हैं?
- मरम्मत आदेश क्यों नहीं हुआ?
- जिम्मेदारी किसकी तय हुई?
और यदि नहीं करता, तो फिर जनता से सेवा शुल्क और भरोसा दोनों क्यों लिया जा रहा है?
छोटी घटना, बड़ा संदेश
कई लोग कह सकते हैं — “सिर्फ हवा मशीन ही तो खराब थी।”
लेकिन असली मुद्दा मशीन नहीं, सिस्टम का रवैया है।
क्योंकि जहां:
- शिकायत पर जवाब न मिले,
- जिम्मेदार व्यक्ति का नंबर न मिले,
- सुविधा महीनों बंद रहे,
- और शिकायत की कॉपी तक न दी जाए,
वहां समस्या तकनीकी नहीं, प्रशासनिक बन जाती है।
अब देखना यह है कि नगर निगम इस मामले को “छोटी शिकायत” मानकर टालता है या इसे जनता के भरोसे से जुड़े मुद्दे की तरह लेकर व्यवस्था सुधारता है।















