शहीद नंदकुमार पटेल यूनिवर्सिटी में दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी का भव्य समापन; कुलपति प्रो. विनय चौहान बोले—यह आयोजन विश्वविद्यालय के लिए ‘मील का पत्थर’
कवि अरुण कमल ने मुकुटधर पाण्डेय के अवदान को किया नमन; ब्रिटेन से आए तेजेंद्र शर्मा ने ‘गोद उतराई’ से मोहा सबका मन
रायगढ़: साहित्य, संस्कृति और बौद्धिक मंथन की त्रिवेणी रायगढ़ में ऐसा गर्जी कि सात समंदर पार तक उसकी गूंज सुनाई दी! शहीद नंदकुमार पटेल विश्वविद्यालय, विश्व हिन्दी अधिष्ठान न्यास, केंद्रीय हिन्दी निदेशालय (शिक्षा मंत्रालय, भारत सरकार) और देवम फाउंडेशन (बुल्गारिया) के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी ‘इक्कीसवीं सदी का हिन्दी साहित्य : विविध परिदृश्य’ का शनिवार (31 अक्टूबर 2026) को ऐसा धमाकेदार समापन हुआ, जिसने इतिहास रच दिया।
दो दिनों तक चले इस साहित्यिक महाकुंभ में भारत के कोने-कोने के साथ-साथ 7 देशों के शीर्ष साहित्यकार, शिक्षाविद और शोधार्थी ऑफलाइन और ऑनलाइन माध्यम से जुड़े और समकालीन साहित्य के हर पहलू पर बेबाक मंथन किया।
अरुण कमल की अध्यक्षता में सजा वैचारिक दरबार
संगोष्ठी के दूसरे दिन के सत्रों की अध्यक्षता करते हुए साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित देश के प्रख्यात कवि व विचारक अरुण कमल ने छायावाद के प्रणेता पद्मश्री मुकुटधर पाण्डेय को नमन किया। उन्होंने कहा कि “रायगढ़ की यह पावन भूमि हमेशा से साहित्यिक साधना की उर्वर धरा रही है।” उन्होंने वक्ताओं के तर्कों और विमर्श के स्तर की मुक्तकंठ से सराहना करते हुए कहा कि यह हिन्दी आलोचना के उज्ज्वल भविष्य का स्पष्ट संकेत है।
अंतरराष्ट्रीय तड़का: ब्रिटेन से आए तेजेंद्र शर्मा और बुल्गारिया से डॉ. मौना कौशिक
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तेजेंद्र शर्मा (ब्रिटेन): अंतरराष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त वरिष्ठ कथाकार ने अपनी चर्चित और संवेदनशील कहानी ‘गोद उतराई’ का ऐसा सस्वर पाठ किया कि प्रवासी जीवन की जटिलताएं और मानवीय संवेदनाएं जीवंत हो उठीं।
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डॉ. मौना कौशिक (बुल्गारिया): उन्होंने प्रवासी महिला लेखिकाओं के अवदान पर रोशनी डालते हुए कहा कि सात समंदर पार बैठकर भी इन रचनाकारों ने भारतीय जीवन-मूल्यों को वैश्विक पहचान दी है।
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डॉ. चन्द्रिका चौधरी: वरिष्ठ कथाकार ने अपनी कहानी से समकालीन सामाजिक यथार्थ और अंतर्द्वंद्वों को बेहद सशक्त रूप से प्रस्तुत किया।
इन धुरंधरों ने भी रखे बेबाक विचार
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स्त्री-विमर्श: डॉ. सुषमा देवी ने कहा कि इक्कीसवीं सदी का स्त्री-लेखन अब प्रतिरोध से आगे बढ़कर आत्मनिर्भरता और निर्णय लेने की स्वतंत्रता का गवाह बन रहा है।
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भारत विभाजन: डॉ. सौरभ सराफ ने कहा कि विभाजन केवल 1947 की राजनीतिक घटना नहीं, बल्कि उपन्यासों में विस्थापन और निरंतर रिसते मानवीय घावों का जीवंत आख्यान है।
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कथेतर गद्य: डॉ. सीमा रानी प्रधान ने बताया कि आत्मकथ्यपरक गद्य विधाएं पाठकों से सीधा संवाद स्थापित कर रही हैं।
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विविध विमर्श: डॉ. रमेश चंद्र श्रीवास्तव व डॉ. रामायण प्रसाद टंडन (विकलांग, दलित एवं आदिवासी विमर्श), डॉ. हेमचंद्र पाण्डेय (जीवनी साहित्य), प्रमोद झा (हिन्दी पत्रकारिता), अंजनी तिवारी ‘सुधाकर’ (व्यंग्य व डायरी), अंकुर शुक्ला (साहित्य पर मीडिया का प्रभाव) और डॉ. गजेन्द्र तिवारी (विज्ञान और तकनीकी का प्रभाव) ने अपने आलेखों से दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया। इस सत्र का धन्यवाद ज्ञापन डॉ. बी. के. भगत ने किया।
कुलपति प्रो. विनय चौहान का बड़ा ऐलान: “यह मील का पत्थर है!”
समापन समारोह की अध्यक्षता करते हुए शहीद नंदकुमार पटेल विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. विनय चौहान ने घोषणा की कि यह अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी विश्वविद्यालय की अकादमिक यात्रा का मील का पत्थर है। उन्होंने कहा कि यूनिवर्सिटी भविष्य में भी ऐसे बड़े अंतरराष्ट्रीय आयोजनों की श्रृंखला जारी रखेगी ताकि छात्र-शोधार्थी देश-विदेश के दिग्गजों के ज्ञान से लाभान्वित होते रहें।
सफल संचालन और आभार
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मंच संचालन: दिल्ली यूनिवर्सिटी के ऊर्जावान सहायक प्राध्यापक डॉ. सौरभ सराफ ने अपने सधे हुए अंदाज से पूरे कार्यक्रम में समां बांधे रखा।
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आभार प्रदर्शन: विश्व हिन्दी अधिष्ठान न्यास के संस्थापक-अध्यक्ष एवं मुख्य संयोजक डॉ. मीनकेतन प्रधान ने सभी संस्थाओं, अतिथियों और शोधार्थियों के प्रति दिल से आभार जताया। उन्होंने घोषणा की कि इस संगोष्ठी के चुनिंदा उत्कृष्ट शोध-पत्रों को जल्द ही ISBN युक्त उच्चस्तरीय ग्रंथ के रूप में प्रकाशित किया जाएगा।
भव्य समापन पर अतिथियों को शॉल, श्रीफल और स्मृति चिह्न भेंटकर सम्मानित किया गया। इस महाआयोजन ने रायगढ़ को एक बार फिर वैश्विक साहित्यिक मानचित्र पर स्वर्ण अक्षरों में अंकित कर दिया है!