डॉ. शगुफ्ता परवीन की कलम से
(अंतर्राष्ट्रीय अंतरात्मा दिवस विशेष)
आज के दौर में, जब समाज अक्सर संवेदनहीनता और स्वार्थ के आरोपों से घिरा नजर आता है, ऐसे समय में कुछ घटनाएं उम्मीद की लौ जला जाती हैं। 18–19 फरवरी की एक घटना, जिसमें एक मासूम बच्ची भीड़ के बीच बिछड़ गई और एक अनजान युवती ने उसे सुरक्षित उसके परिजनों तक पहुंचाया—सिर्फ एक सामान्य घटना नहीं, बल्कि समाज के लिए एक गहरा संदेश है।
यह घटना हमें याद दिलाती है कि इंसानियत अभी भी जिंदा है—बस उसे सुनने और अपनाने की जरूरत है। भीड़ की अराजकता, भय और हिंसा के बीच जब हर कोई अपनी सुरक्षा में व्यस्त था, तब एक युवती ने अपने भीतर की “अंतरात्मा” की आवाज सुनी और बिना किसी स्वार्थ के मदद के लिए आगे बढ़ी। यही वह क्षण है, जो इंसान को भीड़ से अलग और ऊंचा बनाता है।
सवाल यह है कि क्या हम भी ऐसे ही हालात में वही कर पाएंगे?
या फिर हम भी भीड़ का हिस्सा बनकर अपनी संवेदनाओं को दबा देंगे?
आज “अंतर्राष्ट्रीय अंतरात्मा दिवस” पर यह घटना एक आईना है, जो हमें खुद से सवाल पूछने को मजबूर करती है। हम कितनी बार अपने आसपास हो रही गलतियों के खिलाफ आवाज उठाते हैं? कितनी बार किसी जरूरतमंद की मदद के लिए आगे आते हैं?
सच्चाई यह है कि अंतरात्मा की आवाज हर किसी के भीतर होती है, लेकिन उसे सुनने और उस पर अमल करने का साहस बहुत कम लोग जुटा पाते हैं। यही साहस समाज को बेहतर बनाता है।
सिमरन तलरेजा जैसी युवतियां हमें यह सिखाती हैं कि इंसानियत किसी पद, पहचान या प्रसिद्धि की मोहताज नहीं होती। यह एक भावना है, जो सही समय पर सही निर्णय लेने के लिए प्रेरित करती है।
आज जरूरत इस बात की है कि हम अपने भीतर झांकें, अपनी अंतरात्मा की आवाज को पहचानें और उसे दबाने के बजाय उसे अपनी ताकत बनाएं। क्योंकि जब-जब इंसान अपनी अंतरात्मा को सुनता है, तब-तब समाज में सकारात्मक बदलाव की शुरुआत होती है।
“भीड़ का हिस्सा बनना आसान है, लेकिन इंसान बनकर खड़ा होना ही असली साहस है।”















