निगम आयुक्त प्रकाश कुमार सर्वे से मांग: बदहाल शौचालयों पर स्वच्छता नोडल अधिकारी खजांची कुम्हार पर भी हो कार्रवाई

सफाई की हकीकत बनाम कागज़ी दावे: बिलासपुर में जवाबदेही कौन तय करेगा?

क्या हर बार निगम आयुक्त ही करेंगे निरीक्षण? जिम्मेदार अफसर आखिर कब जागेंगे!

जब सिस्टम सोया, तो कमिश्नर ने संभाली कमान – जिम्मेदारों पर कब गिरेगी गाज?

शौचालयों की बदहाली ने खोली पोल – क्या फील्ड अफसर सिर्फ वेतन लेने के लिए हैं?

Bilaspur में सार्वजनिक और सामुदायिक शौचालयों की बदहाल स्थिति ने एक बार फिर प्रशासनिक जवाबदेही पर सवाल खड़े कर दिए हैं। नगर निगम आयुक्त Prakash Kumar Sarve ने निरीक्षण के दौरान गंदगी और अव्यवस्था पाए जाने पर संचालन कंपनी Sulabh International को नोटिस जारी किया। पुराना बस स्टैंड और व्यापार विहार के शौचालयों में साफ-सफाई का अभाव सिर्फ एक “साइट विज़िट” का मुद्दा नहीं, बल्कि सिस्टम की विफलता का आईना है।

सवाल सिर्फ कंपनी से नहीं, सिस्टम से भी

नोटिस देना जरूरी कदम है, लेकिन असली प्रश्न है—

  • क्या नियमित मॉनिटरिंग हो रही थी?

  • क्या हेल्थ/सैनिटेशन विंग की दैनिक/साप्ताहिक चेकलिस्ट लागू थी?

  • क्या भुगतान “परफॉर्मेंस-लिंक्ड” है या सिर्फ उपस्थिति के आधार पर?

अगर निरीक्षण में कमियां उजागर हुईं, तो इसका मतलब है कि फील्ड-लेवल सुपरविजन कमजोर था। जब तक अनुबंध (Contract) में स्पष्ट SLA (Service Level Agreement), पेनल्टी क्लॉज और थर्ड-पार्टी ऑडिट लागू नहीं होंगे, नोटिस औपचारिकता बनकर रह जाएगा।

मोटा वेतन, हल्की जिम्मेदारी?

सरकारी अमले को करदाताओं के पैसे से वेतन मिलता है। यदि शौचालय जैसी बुनियादी सुविधा में भी मानक नहीं निभाए जा रहे, तो संबंधित अधिकारियों की जवाबदेही तय होनी चाहिए।

  • क्या संबंधित जोन/वार्ड अधिकारी ने नियमित निरीक्षण रिपोर्ट जमा की?

  • क्या फोटो-एविडेंस और जियो-टैग्ड रिकॉर्ड उपलब्ध हैं?

  • क्या शिकायत निवारण पोर्टल पर आई शिकायतों का समयबद्ध समाधान हुआ?

यदि इन सवालों के जवाब “नहीं” में हैं, तो यह सिर्फ कंपनी की चूक नहीं—निगरानी तंत्र की भी विफलता है। ऐसे में डिपार्टमेंटल इन्क्वायरी, शो-कॉज नोटिस और वेतन/इन्क्रीमेंट पर प्रभाव जैसे कठोर कदम उठाए जाने चाहिए।

राजस्व समीक्षा: लक्ष्य बनाम जमीनी हकीकत

आयुक्त द्वारा जोन 8, वार्ड 66 में राजस्व वसूली की समीक्षा और वित्तीय वर्ष समाप्ति तक 100% वसूली के निर्देश स्वागतयोग्य हैं। पर सवाल यह भी है कि—

  • क्या बकायेदारों की सूची सार्वजनिक है?

  • क्या बड़े बकायेदारों पर समान कठोरता दिखाई जाती है?

  • क्या फील्ड-स्टाफ को पर्याप्त संसाधन और डिजिटल टूल दिए गए हैं?

राजस्व सख्ती और स्वच्छता ढील—यह दोहरा मापदंड नहीं चल सकता। नागरिकों से टैक्स वसूली तब नैतिक ठहरती है, जब बदले में बुनियादी सेवाएं मानक के अनुरूप मिलें।

 आगे क्या होना चाहिए?

  1. परफॉर्मेंस-लिंक्ड पेमेंट: शौचालयों के लिए KPI तय हों—दैनिक सफाई, डिसइन्फेक्शन, पानी/लाइट की उपलब्धता, उपभोक्ता फीडबैक स्कोर।

  2. थर्ड-पार्टी ऑडिट: हर माह स्वतंत्र एजेंसी से निरीक्षण और रिपोर्ट सार्वजनिक पोर्टल पर अपलोड।

  3. रियल-टाइम मॉनिटरिंग: जियो-टैग्ड फोटो, टाइम-स्टैम्प्ड चेकलिस्ट और QR-कोड आधारित फीडबैक सिस्टम।

  4. कड़ी पेनल्टी: SLA उल्लंघन पर आर्थिक दंड, बार-बार उल्लंघन पर अनुबंध समाप्ति।

  5. अधिकारी जवाबदेही मैट्रिक्स: संबंधित जोन/वार्ड अधिकारी की ACR में सेवा-गुणवत्ता सूचकांक शामिल हो।

  6. सार्वजनिक डैशबोर्ड: सफाई, शिकायतें, समाधान समय—सब कुछ पारदर्शी।

“नोटिस” नहीं, “नतीजा” चाहिए

शहर की गरिमा शौचालयों की स्थिति से भी मापी जाती है। यदि निरीक्षण में पोल खुली है, तो कार्रवाई भी दिखनी चाहिए—सिर्फ कंपनी पर नहीं, निगरानी करने वाले अधिकारियों पर भी। करदाता जवाब चाहता है: कब तक गंदगी पर नोटिस और सिस्टम पर मौन?

अब समय है—जवाबदेही तय हो, अनुबंध सख्त हों, और शहर को कागज़ी नहीं, वास्तविक स्वच्छता मिले।

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