बिलासपुर: 25 साल की जैनब बनीं दाऊदी बोहरा समाज की पहली महिला एडवोकेट, हाईकोर्ट में लहरा रहीं कामयाबी का परचम

(सुरेंद्र वर्मा – डॉ. शगुफ्ता परवीन) की कलम से

विश्व महिला दिवस पर बिलासपुर की बेटी ने रचा इतिहास, बोलीं—हर लड़की को अपने अधिकारों के लिए खड़ा होना चाहिए

बोहरा जमात की पहली महिला एडवोकेट बनीं जैनब ओडवानी, उम्मीदों की नई आइकन

बिलासपुर।विश्व महिला दिवस 2026 के मौके पर बिलासपुर की 25 वर्षीय जैनब ओडवानी ने एक नई मिसाल कायम की है। जैनब अपने शहर के दाऊदी बोहरा समाज की पहली महिला एडवोकेट बनकर न केवल अपने परिवार बल्कि पूरे समाज का नाम रोशन कर रही हैं।

खपरगंज क्षेत्र में करीब एक से डेढ़ सौ साल से बसे दाऊदी बोहरा समाज में अब तक कोई महिला वकालत के पेशे में नहीं पहुंची थी। ऐसे में जैनब की यह उपलब्धि समाज की लड़कियों के लिए प्रेरणा बन गई है।

मात्र 25 साल की उम्र में जैनब पिछले तीन वर्षों से छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में वकालत कर रही हैं। उनका कहना है कि सपनों को पूरा करने के लिए मुश्किलों से डरना नहीं चाहिए, बल्कि साहस और जुनून के साथ आगे बढ़ना चाहिए।

जैनब की वालिदा फरीदा ओडवानी बताती हैं कि बचपन से ही जैनब के स्वभाव में अन्याय के खिलाफ आवाज उठाने की आदत रही है। गलत देखकर चुप रहना उन्हें कभी मंजूर नहीं रहा और यही सोच उन्हें कानून के पेशे तक लेकर आई।

जैनब मानती हैं कि कानून की पढ़ाई सिर्फ एक डिग्री नहीं बल्कि आत्मविश्वास, निर्भीकता और स्पष्ट सोच भी देती है। उनका कहना है कि हर महिला और लड़की को अपने कानूनी अधिकारों की बुनियादी जानकारी जरूर होनी चाहिए, तभी घरेलू हिंसा, मानसिक अत्याचार और आर्थिक असमानता जैसी समस्याओं से लड़ना संभव होगा।

वह यह भी कहती हैं कि समाज में सम्मान और संयम हर रिश्ते की बुनियाद है। पुरुषों को भी यह समझना चाहिए कि ताकत का मतलब हिंसा नहीं बल्कि जिम्मेदारी है।

विश्व महिला दिवस 2026

महिला दिवस पर सम्मानित होने को लेकर जैनब कहती हैं कि यह सिर्फ उनकी व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं है, बल्कि उन सभी महिलाओं की आवाज है जो अपने सपनों और अधिकारों के लिए आगे बढ़ना चाहती हैं।

जैनब का मानना है कि बदलाव तब शुरू होता है जब महिलाएं अपने लिए बोलने का साहस जुटाती हैं।

अंत में मशहूर शायर अल्लामा इकबाल का यह शेर उनकी शख्सियत पर बिल्कुल सटीक बैठता है—

“वजूद-ए-ज़न से है तस्वीर-ए-कायनात में रंग,
इसी के साज़ से है ज़िंदगी का सोज़-ए-दरूँ।”

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