मंत्री से पहले PA का दरबार! बिलासपुर में पत्रकारों को रोकने की कोशिश, लेकिन केंद्रीय राज्यमंत्री सावित्री ठाकुर ने खोली संवाद की राह

केंद्रीय राज्यमंत्री सावित्री ठाकुर के PA के व्यवहार पर उठे सवाल, जनप्रतिनिधियों की साख पर पड़ता है असर

बिलासपुर। लोकतंत्र में जनता और सरकार के बीच मीडिया एक मजबूत सेतु माना जाता है, लेकिन जब इस सेतु को ही रोकने की कोशिश होने लगे तो सवाल उठना स्वाभाविक है। केंद्रीय महिला एवं बाल विकास राज्यमंत्री Savitri Thakur के बिलासपुर प्रवास के दौरान कुछ ऐसा ही घटनाक्रम सामने आया, जिसने मंत्री से ज्यादा उनके स्टाफ के रवैये को चर्चा का विषय बना दिया।

सूत्रों के अनुसार, सर्किट हाउस में जब वरिष्ठ पत्रकार मंत्री से मुलाकात और चर्चा के लिए पहुंचे तो उनके एक निजी सहायक (PA) ने पत्रकारों से यह कहते हुए मुलाकात टालने का प्रयास किया कि “कल पत्रकारों से बात हो चुकी है, अब मंत्री जी का मीडिया से बात करने में कोई इंटरेस्ट नहीं है।”

PA का यह कथन सुनकर कई पत्रकार हैरान रह गए। सवाल यह था कि क्या एक जनप्रतिनिधि, वह भी केंद्र सरकार की मंत्री, मीडिया से संवाद में रुचि नहीं रखतीं या फिर यह किसी अधिकारी की व्यक्तिगत सोच थी?

मगर कहानी में मोड़ तब आया जब मंत्री बाहर निकलीं। पत्रकारों ने सीधे उनसे सवाल किया तो मंत्री ने साफ शब्दों में कहा कि उन्होंने ऐसा कोई निर्देश नहीं दिया है। इसके बाद उन्होंने पत्रकारों से सहजता और सौहार्दपूर्ण वातावरण में चर्चा भी की।

यहीं से पूरा मामला पलट गया।

PA की ‘फिल्टर पॉलिटिक्स’ या मंत्री की छवि को नुकसान?

राजनीतिक गलियारों में अब चर्चा इस बात की है कि आखिर किस अधिकार से कोई PA मीडिया और मंत्री के बीच दीवार बनने की कोशिश कर रहा था? यदि मंत्री स्वयं संवाद के पक्ष में थीं, तो फिर पत्रकारों को रोकने की पहल किसके इशारे पर हुई?

जानकारों का मानना है कि ऐसे लोग अक्सर नेताओं के आसपास “पावर सेंटर” बनने की कोशिश करते हैं और अनजाने में अपने वरिष्ठ की छवि को नुकसान पहुंचाते हैं। जनता और मीडिया में यह संदेश जाता है कि नेता संवाद से बच रहे हैं, जबकि वास्तविकता कुछ और होती है।

सरल मंत्री, जटिल स्टाफ!

बिलासपुर की घटना ने एक बार फिर साबित कर दिया कि कई बार नेताओं की छवि विपक्ष नहीं, बल्कि उनके आसपास मौजूद कुछ अतिउत्साही सहयोगी खराब कर देते हैं। मंत्री का व्यवहार जहां सहज और सकारात्मक दिखा, वहीं PA का रवैया सवालों के घेरे में आ गया।

अगर मंत्री मीडिया से बात करने को तैयार थीं, तो फिर पत्रकारों को “नो इंटरेस्ट” का संदेश किसने और क्यों दिया?

कहीं ऐसा तो नहीं कि कुछ लोग मंत्री से ज्यादा खुद को मंत्री समझने लगे हैं?

लोकतंत्र में जनता के सवालों से बचने की कोशिश करने वाले ऐसे “दरबारी फिल्टर” अगर समय रहते नहीं हटाए गए, तो वे नेताओं की लोकप्रियता पर भी ग्रहण लगा सकते हैं। राजनीतिक जानकारों का कहना है कि जनता से संवाद चाहने वाले नेताओं को ऐसे तत्वों की पहचान कर उन्हें “लूप लाइन” में भेजने पर गंभीरता से विचार करना चाहिए।

 लोकतंत्र में संवाद ही सबसे बड़ी ताकत है। मंत्री ने संवाद कर सकारात्मक संदेश दिया, लेकिन उनके आसपास मौजूद कुछ लोगों का रवैया इस संदेश को कमजोर करता दिखाई दिया।)

  • पंकज खण्डेलवाल

    Pankaj Khandelwal is the Founder & Principal Editor of News Hub Insight (NHI). He is an independent journalist with expertise in governance, education, public policy, civic issues and investigative reporting. His reporting is based on accuracy, public interest and responsible journalism. Every article published under his editorial supervision follows News Hub Insight's Editorial Policy, Fact Check Policy and Correction Policy.

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