स्कूल में शिक्षा जरूरी या रील की लोकप्रियता? आत्मानंद विद्यालय पर उठते सवालों का जवाब कौन देगा?
बिलासपुर। स्कूल बच्चों का भविष्य गढ़ने की जगह है, किसी की सोशल मीडिया लोकप्रियता बढ़ाने का मंच नहीं। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, सरकंडा स्थित आत्मानंद शासकीय बालक उच्चतर माध्यमिक विद्यालय की एक शिक्षिका पर विद्यार्थियों से अपने सोशल मीडिया अकाउंट को लाइक और फॉलो कराने के आरोप ने शिक्षा व्यवस्था की जवाबदेही पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
मामला केवल रील बनाने या सोशल मीडिया इस्तेमाल करने का नहीं है। सवाल यह है कि क्या शिक्षक और विद्यार्थी के बीच के जिम्मेदारीपूर्ण रिश्ते का इस्तेमाल निजी लोकप्रियता बढ़ाने के लिए किया जा रहा है? यदि विद्यार्थियों पर किसी शिक्षक के प्रभाव के कारण लाइक-फॉलो करने का दबाव बनाया गया, तो यह सामान्य सोशल मीडिया गतिविधि नहीं, बल्कि जांच का विषय है।
विवादों की फेहरिस्त, जवाबदेही कहां?
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, विद्यालय पहले भी विभिन्न आरोपों और विवादों को लेकर चर्चा में रहा है। अब शिक्षिका की रील और विद्यार्थियों से लाइक-फॉलो कराने की शिकायत ने एक बार फिर प्रबंधन की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े किए हैं। संबंधित शिक्षिका की एक पुरानी रील को लेकर पुलिस कार्रवाई और गिरफ्तारी की बात भी सामने आई थी। ऐसे में यह जानना जरूरी है कि शिक्षा विभाग ने उस मामले में कोई विभागीय कार्रवाई की या नहीं।
हालांकि, हर आरोप को प्रमाणित तथ्य मान लेना उचित नहीं है। लेकिन आरोपों की गंभीरता को देखते हुए उनकी निष्पक्ष जांच करना विभाग की जिम्मेदारी जरूर है।
प्राचार्य की जिम्मेदारी से विभाग की जवाबदेही तक
यदि विद्यार्थियों ने अपनी आपत्ति शिक्षकों और प्राचार्य तक पहुंचाई थी, तो शिकायत पर क्या कदम उठाए गए? क्या संबंधित शिक्षिका से जवाब मांगा गया? क्या जिला शिक्षा अधिकारी को जानकारी दी गई? यदि शिकायत मिली ही नहीं, तो इसकी स्थिति स्पष्ट होनी चाहिए। और यदि शिकायत मिली थी, तो कार्रवाई का विवरण सार्वजनिक किया जाना चाहिए।
प्रबंधन की चुप्पी आरोपों को सच साबित नहीं करती, लेकिन जवाबदेही से बचने का रास्ता भी नहीं बन सकती।
शिक्षक की स्वतंत्रता बनाम विद्यार्थियों के अधिकार
हर शिक्षक को निजी जीवन और सोशल मीडिया इस्तेमाल की स्वतंत्रता है। लेकिन सरकारी विद्यालय में पद की मर्यादा, विद्यार्थियों की स्वतंत्रता और पढ़ाई का वातावरण भी उतना ही महत्वपूर्ण है। यदि विद्यार्थी अपनी इच्छा के विरुद्ध किसी अकाउंट को लाइक या फॉलो करने के लिए दबाव महसूस करते हैं, तो इस पहलू की जांच होनी चाहिए।
विद्यालय में मोबाइल फोन के नियम लागू हैं, तो उनका पालन कैसे हो रहा है? क्या विद्यार्थियों के मोबाइल इस्तेमाल को लेकर कोई शिकायत दर्ज हुई है? इन प्रश्नों का उत्तर तथ्यों और अभिलेखों के आधार पर मिलना चाहिए, न कि केवल आरोप-प्रत्यारोप से।
अब जांच हो, केवल खानापूर्ति नहीं
जिला शिक्षा अधिकारी और शिक्षा विभाग को चाहिए कि वे शिकायतों की वास्तविक स्थिति की जांच करें, संबंधित विद्यार्थियों के बयान संवेदनशीलता के साथ दर्ज करें, शिक्षिका और प्राचार्य का पक्ष लें तथा उपलब्ध डिजिटल साक्ष्यों की निष्पक्ष पड़ताल करें। आरोप प्रमाणित होने पर नियमानुसार कार्रवाई हो और आरोप गलत पाए जाने पर स्थिति स्पष्ट की जाए।
शिक्षा व्यवस्था की विश्वसनीयता केवल भवनों, स्मार्ट कक्षाओं और योजनाओं से नहीं बनती। वह शिक्षकों के आचरण, प्रबंधन की सक्रियता और विभाग की निष्पक्षता से बनती है।
आखिरकार, सवाल किसी की रील का नहीं, स्कूल की जिम्मेदारी का है। बच्चों का समय पढ़ाई में लगना चाहिए, न कि किसी की ऑनलाइन लोकप्रियता बढ़ाने की कथित कवायद में। आत्मानंद विद्यालय प्रबंधन और शिक्षा विभाग को अब स्पष्ट करना होगा कि विद्यार्थियों की शिकायतों पर कार्रवाई होगी या यह मामला भी दूसरे विवादों की तरह फाइलों और खामोशी में दबकर रह जाएगा?
क्योंकि स्कूल की पहचान रील के व्यूज से नहीं, बच्चों के भविष्य से तय होती है।
उक्त लेख मीडिया रिपोर्ट्स के आधार पर बनाया गया है।







