बिलासपुर वन विभाग की तानाशाही: DFO नीरज की गैर-जिम्मेदारी से शासन की साख पर बट्टा, मीडिया और जनता से छिपाया जा रहा ‘सरकारी इवेंट’
वन्यप्राणी संरक्षण सप्ताह: बिलासपुर वन विभाग की ‘गोपनीय’ कार्यप्रणाली, आयोजन के दूसरे दिन भी मीडिया और जनता से दूरी, गंभीरता पर उठे सवाल
जब हमारी खोजी टीम वन्यप्राणी संरक्षण सप्ताह के शुभारंभ के दिन यानी 2 अक्टूबर को बिलासपुर के वन विभाग कार्यालय पहुंची, तो नजारा चौंकाने वाला था। इतने बड़े और संवेदनशील जन-जागरूकता अभियान को लेकर कार्यालय परिसर में एक भी बैनर या पोस्टर नहीं दिखा, जो विभाग की शुरुआती उदासीनता को साफ बयां करता है।
कार्यालय में मौजूद रेंजर यशपाल से जब इस आयोजन के संबंध में जानकारी मांगी गई, तो उन्होंने बताया कि 2 अक्टूबर से 8 अक्टूबर तक यह आयोजन अलग-अलग क्षेत्रों में किया जाएगा और इसका शुभारंभ 2 अक्टूबर को ‘बेलरा’ से होना बताया।
आज 3 अक्टूबर को खबर लिखे जाने तक, इस पूरे आयोजन की कोई भी आधिकारिक जानकारी मीडिया तक नहीं पहुंचाई गई है। लोकतंत्र के चौथे स्तंभ और जनता के बीच सेतु का काम करने वाली मीडिया को इस अभियान से पूरी तरह काटकर रखना बेहद चिंता का विषय है। जब वन्यप्राणी संरक्षण जैसा गंभीर मुद्दा जन-भागीदारी पर निर्भर करता है, तो आखिर विभाग इसे गुप्त रखकर क्या साबित करना चाहता है?
इस पूरे आयोजन के लिए शासन की ओर से कितना फंड (बजट) आवंटित हुआ है, इस पर रेंजर महोदय ने पूरी तरह चुप्पी साध ली। जब इस संदर्भ में बिलासपुर डीएफओ नीरज कुमार से संपर्क करने का प्रयास किया गया और उन्हें फोन लगाया गया, तो उन्होंने मीडिया का फोन उठाना भी मुनासिब नहीं समझा। एक जिम्मेदार शीर्ष अधिकारी की यह गतिविधि दर्शाती है कि वे इस संवेदनशील अभियान को लेकर कितने गंभीर हैं।
..जब यह आयोजन जन-जागरूकता के लिए है, तो इसे आम जनता और मीडिया से गोपनीय क्यों रखा जा रहा है?
- डीएफओ का आधिकारिक पत्र व्हाट्सएप पर भेजने के बाद तुरंत डिलीट करने के पीछे क्या राज है?
- आज 3 अक्टूबर तक मीडिया को सूचना न देना, क्या विभाग की किसी बड़ी नाकामी या बजट की लीपापोती को छिपाने का प्रयास है?
- आयोजन के बजट और खर्च को लेकर विभाग पारदर्शिता बरतने से क्यों कतरा रहा है?





