विकलांग और किन्नर विमर्श के बाद अब कृषक-विमर्श की दस्तक, डॉ. पाठक की नई कृति का लोकार्पण
महामण्डलेश्वर स्वामी हरिहरानन्द सरस्वती ने किया ग्रंथ का विमोचन, विद्वानों ने कहा—कृषक जीवन पर केंद्रित यह विमर्श साहित्य में नई दिशा का संकेत
बिलासपुर। भारतीय साहित्य और सामाजिक विमर्श के क्षेत्र में एक नई वैचारिक पहल के रूप में ‘कृषक-विमर्श : दशा और दिशा’ ग्रंथ का लोकार्पण महामण्डलेश्वर स्वामी डॉ. हरिहरानन्द सरस्वती जी महाराज, परमाध्यक्ष, दैवी सम्पद मण्डल, अमरकंटक (म.प्र.) के कर-कमलों से किया गया। यह ग्रंथ डॉ. विनय कुमार पाठक, पूर्व अध्यक्ष, छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग एवं कुलपति, थावे विद्यापीठ, गोपालगंज (बिहार) द्वारा रचित है।
लोकार्पण अवसर पर महामण्डलेश्वर स्वामी हरिहरानन्द सरस्वती जी महाराज ने डॉ. विनय कुमार पाठक को अस्मितामूलक विमर्श के एक नए आयाम—कृषक-विमर्श—को साहित्यिक एवं वैचारिक आधार देने के लिए बधाई और शुभकामनाएं दीं। उन्होंने कहा कि कृषक भारतीय समाज और अर्थव्यवस्था की आधारशिला हैं और उनके जीवन, संघर्ष, संवेदना तथा योगदान को विमर्श के केंद्र में लाना महत्वपूर्ण साहित्यिक पहल है।
कार्यक्रम में न्यायमूर्ति डॉ. चन्द्र भूषण बाजपेयी ने कहा कि डॉ. विनय कुमार पाठक ने विकलांग-विमर्श को विश्व क्षितिज तक पहुंचाने के साथ-साथ किन्नर-आलोचना के क्षेत्र में भी महत्वपूर्ण कार्य किया है। अब कृषक-विमर्श पर मौलिक स्थापना प्रस्तुत कर उन्होंने साहित्यिक विमर्श को एक नया आयाम दिया है।
धर्मभूषण डॉ. श्रीधर गौरहा ने ग्रंथ की समीक्षा करते हुए कहा कि कृषक-विमर्श अब तक अपेक्षाकृत अस्पर्शित रहा है। डॉ. पाठक ने इस विषय को व्यापक दृष्टि और समग्रता के साथ सामने लाने का उल्लेखनीय प्रयास किया है। उन्होंने ग्रंथ को कृषक जीवन और साहित्य के बीच संवाद स्थापित करने वाली महत्वपूर्ण कृति बताया।
मानस मर्मज्ञ विष्णु कुमार तिवारी ने कहा कि स्त्री, दलित और आदिवासी-विमर्श जैसे क्षेत्रों में अपनी विशिष्ट पहचान बनाने वाले डॉ. पाठक ने पहले विकलांग-विमर्श को प्रवर्तित किया, फिर किन्नर-आलोचना पर दो महत्वपूर्ण ग्रंथ लिखे और अब कृषक-विमर्श के प्रथम समीक्षक के रूप में अपनी विशिष्ट उपस्थिति दर्ज कराई है।
काव्य से शुरू हुआ कृषक-विमर्श, अगला पड़ाव होगा गद्य
ग्रंथ के लेखक डॉ. विनय कुमार पाठक ने बताया कि ‘कृषक-विमर्श : दशा और दिशा’ का प्रथम भाग प्रकाशित हुआ है, जो मुख्यतः काव्य में कृषक-विमर्श पर केंद्रित है। उन्होंने कहा कि इसका दूसरा भाग शीघ्र ही पाठकों के हाथों में होगा, जिसमें गद्य की प्रमुख विधाओं में कृषक-विमर्श के स्वरूप, सरोकार और अभिव्यक्ति को शामिल किया गया है।
उन्होंने कहा कि कृषक केवल अन्नदाता नहीं, बल्कि भारतीय सामाजिक संरचना, संस्कृति और अर्थव्यवस्था के महत्वपूर्ण आधार हैं। इसलिए साहित्य में उनके जीवन और संघर्ष को स्वतंत्र विमर्श के रूप में देखना समय की आवश्यकता है।
लोकार्पण समारोह में भागवताचार्य पं. संकल्प शुक्ला, पं. लव चौबे, पं. योगेश तिवारी सहित अनेक गणमान्य नागरिक एवं साहित्यप्रेमी उपस्थित रहे।
‘कृषक-विमर्श : दशा और दिशा’ का यह लोकार्पण साहित्य में किसान को केवल पात्र नहीं, बल्कि एक स्वतंत्र विमर्श के केंद्र के रूप में स्थापित करने की दिशा में महत्वपूर्ण पहल माना जा रहा है।






