कविता नहीं, साहित्यकार गढ़ते थे ‘विप्र’ जी: काव्यांजलि में गूंजा शब्दों का सम्मान

बिलासपुर। साहित्य और संस्कार की समृद्ध परंपरा के अग्रदूत स्वर्गीय पंडित द्वारिका प्रसाद तिवारी ‘विप्र’ की 119वीं जयंती पर सोमवार सायंकाल उसलापुर स्थित साईं आनंदम परिसर में भावपूर्ण ‘विप्र जी को काव्यांजलि’ कार्यक्रम आयोजित किया गया। यह आयोजन साहित्य वृंद बिलासपुर एवं भारतेंदु साहित्य समिति के संयुक्त तत्वावधान में संपन्न हुआ, जिसमें शहर के वरिष्ठ साहित्यकारों और कवियों ने अपनी रचनाओं के माध्यम से ‘विप्र’ जी को श्रद्धासुमन अर्पित किए।

कार्यक्रम का संचालन वरिष्ठ साहित्यकार हरबंस शुक्ल ने प्रभावी ढंग से किया। मुख्य अतिथि ओमप्रकाश भट्ट तथा अध्यक्षता वरिष्ठ साहित्यकार सनत तिवारी ने की।

वरिष्ठ साहित्यकार अमृत लाल पाठक ने ‘विप्र’ जी के साथ जुड़े संस्मरण साझा करते हुए कहा कि उनका साहित्यिक अवदान केवल पुस्तकों तक सीमित नहीं था, बल्कि उन्होंने नई पीढ़ी को साहित्य की दिशा देने का महत्वपूर्ण कार्य किया।

कार्यक्रम का सबसे भावुक क्षण तब आया जब कवि विजय कल्याणी तिवारी ने अपने पारिवारिक एवं निजी अनुभव साझा करते हुए कहा, “विप्र जी केवल कविता नहीं रचते थे, वे साहित्यकार भी गढ़ते थे।” उनके इस कथन ने पूरे सभागार को भावविभोर कर दिया।

काव्यांजलि में उपस्थित सभी रचनाकारों ने अपनी-अपनी कविताओं के माध्यम से ‘विप्र’ जी के व्यक्तित्व, कृतित्व और साहित्य साधना को स्मरण किया। कार्यक्रम में मनीषा भट्ट, पूर्णिमा तिवारी, बुधराम यादव, आर.के. द्विवेदी, राकेश अयोध्या, मयंक दुबे, आर.एन. राजपूत, मनीशंकर दुबे, शंकर साहू सहित अनेक साहित्यकार एवं स्वर्गीय ‘विप्र’ जी के परिजन बड़ी संख्या में उपस्थित रहे।

कार्यक्रम के अंत में मयंक दुबे ने सभी अतिथियों, साहित्यकारों एवं उपस्थित जनों का आभार व्यक्त किया।

यह आयोजन केवल एक जयंती समारोह नहीं, बल्कि साहित्य, संस्कृति और गुरु-परंपरा के प्रति सम्मान व्यक्त करने का सशक्त अवसर बन गया, जहां शब्दों के माध्यम से एक महान साहित्य साधक को सामूहिक श्रद्धांजलि अर्पित की गई।

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