छत्तीसगढ़ी भाषा और साहित्य के पुरोधा, अंतरराष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त साहित्यकार डॉ. विनय कुमार पाठक ने आज अपने जीवन के 81वें वर्ष में प्रवेश किया
बिलासपुर। छत्तीसगढ़ की माटी से निकलकर राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय साहित्यिक क्षितिज पर अपनी विशिष्ट पहचान स्थापित करने वाले प्रख्यात साहित्यकार, भाषाविद्, शोध निर्देशक एवं शिक्षाविद् डॉ. विनय कुमार पाठक का आज जन्मदिवस है। साहित्य, भाषा विज्ञान और शोध के क्षेत्र में उनका योगदान न केवल छत्तीसगढ़ बल्कि पूरे देश के लिए गौरव का विषय है।
11 जून 1946 को बिलासपुर में जन्मे डॉ. विनय कुमार पाठक की प्रारंभिक शिक्षा से लेकर उच्च शिक्षा तक की यात्रा इसी सांस्कृतिक नगरी में सम्पन्न हुई। उन्होंने हिन्दी एवं भाषा विज्ञान में दो-दो पीएच.डी. तथा दो-दो डी.लिट. जैसी दुर्लभ अकादमिक उपलब्धियाँ हासिल कर साहित्य जगत में अपनी अलग पहचान बनाई। उनके बड़े भाई डॉ. विमल पाठक से मिली साहित्यिक प्रेरणा ने उन्हें लेखन और शोध की उस ऊँचाई तक पहुँचाया, जहाँ आज उनका नाम देश के प्रतिष्ठित साहित्यकारों में सम्मान के साथ लिया जाता है।
डॉ. पाठक ने हिन्दी और छत्तीसगढ़ी दोनों भाषाओं में समान अधिकार के साथ लेखन किया है। लगभग 70 से अधिक ग्रंथों की रचना कर उन्होंने छत्तीसगढ़ी भाषा, साहित्य, लोकसंस्कृति और इतिहास के संरक्षण एवं संवर्धन में अमूल्य योगदान दिया है। उनकी चर्चित कृतियों में छत्तीसगढ़ी लोककथा (1970), छत्तीसगढ़ी साहित्य और साहित्यकार, एक रुख एकेच शाखा, एकादशी अउ अनचिन्हार, बृजलाल शुक्ल : व्यक्तित्व एवं कृतित्व, कपिलनाथ कश्यप : व्यक्तित्व एवं कृतित्व, सीता के दुख (खण्डकाव्य), छत्तीसगढ़ के स्थाननामों का भाषा वैज्ञानिक अध्ययन (2000) सहित अनेक महत्वपूर्ण ग्रंथ शामिल हैं।
भाषा विज्ञान के क्षेत्र में उनका शोध कार्य विशेष रूप से उल्लेखनीय माना जाता है। 1974 में छत्तीसगढ़ी भाषा विज्ञान पर किया गया उनका शोध आज भी शोधार्थियों के लिए मार्गदर्शक माना जाता है। उन्होंने राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अनेक शोधपत्र प्रस्तुत कर छत्तीसगढ़ी भाषा को अकादमिक पहचान दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
शासकीय कन्या स्नातकोत्तर महाविद्यालय में हिन्दी विभागाध्यक्ष के रूप में सेवाएँ देने वाले डॉ. पाठक को प्रदेश का शिखर शोध निर्देशक माना जाता है। उनके निर्देशन में दो दर्जन से अधिक शोधार्थियों ने छत्तीसगढ़ी भाषा और साहित्य की विभिन्न विधाओं पर पीएच.डी. की उपाधि प्राप्त की है। उनकी विद्वता और योगदान का अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि रांची विश्वविद्यालय में उनके व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर शोधार्थियों द्वारा डी.लिट. तक किया जा चुका है।
साहित्य, भाषा और संस्कृति के क्षेत्र में उत्कृष्ट योगदान के लिए उन्हें लोकभाषा शिखर सम्मान, राष्ट्रीय अर्चना सम्मान, विक्रमशिला विश्वविद्यालय भागलपुर द्वारा डी.लिट. विद्यासागर, शब्द सम्राट, संपादक रत्न, शताब्दी रत्न अलंकरण सहित शताधिक राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय सम्मान प्राप्त हो चुके हैं।
डॉ. विनय कुमार पाठक केवल एक साहित्यकार नहीं, बल्कि छत्तीसगढ़ी भाषा और संस्कृति के ऐसे संवाहक हैं जिन्होंने लोकभाषा को विश्वविद्यालयों, शोध संस्थानों और राष्ट्रीय मंचों तक पहुँचाने का ऐतिहासिक कार्य किया है। उनकी लेखनी ने छत्तीसगढ़ की लोक चेतना को शब्द दिए और शोध ने उसे अकादमिक पहचान प्रदान की।
आज उनके जन्मदिवस पर साहित्य, शिक्षा और संस्कृति जगत से जुड़े लोग उन्हें शुभकामनाएँ दे रहे हैं। साहित्य प्रेमियों का मानना है कि डॉ. विनय कुमार पाठक का जीवन आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा, शोध और सृजन का जीवंत विश्वविद्यालय है।
जन्मदिन पर शत-शत नमन एवं हार्दिक शुभकामनाएँ।













