एफआईआर से प्रेस नोट तक विरोधाभास, सरकंडा पुलिस की कार्यप्रणाली पर सवाल
इस मामले में सरकंडा पुलिस की प्रेस विज्ञप्ति अधूरी क्यों?महिला आरोपी सोनम कश्यप को छोड़े जाने की सच्चाई पर पर्दा
बिलासपुर | कोयला व्यापार में मुनाफे का झांसा देकर की गई करोड़ों की ठगी का मामला अब सिर्फ नेहरू उर्फ नेहरू साहू, अतिक उर रहमान उर्फ राजा खान और सोनम कश्यप तक सीमित नहीं रहा। यह केस अब पुलिस रिकॉर्ड की सटीकता और पारदर्शिता पर बड़ा सवाल खड़ा कर रहा है।
पहला बड़ा अंतर: ठगी की रकम
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FIR के अनुसार प्रार्थी अरविंद सिंह पवार ने कुल 1 करोड़ 29 लाख रुपये निवेश किए।
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इसमें से 61,02,626 रुपये वापस मिले।
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शेष 67,97,374 रुपये की ठगी स्पष्ट रूप से दर्ज है।
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लेकिन पुलिस प्रेस विज्ञप्ति में कुल निवेश राशि 1,13,10,000 रुपये बताई गई है।
सवाल साफ है—
क्या निवेश 1.29 करोड़ था या 1.13 करोड़?
अगर रकम ही तय नहीं, तो अपराध की गंभीरता कैसे तय हुई?
यह कोई मामूली गलती नहीं, बल्कि 16 लाख रुपये से अधिक का अंतर है, जो सीधे-सीधे धाराओं, जमानत और सजा को प्रभावित करता है।
दूसरा विरोधाभास: अपराध की समय-सीमा
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FIR में अपराध की तिथि 08 अप्रैल 2025 और समय “पहर 4 – 11:58 बजे” दर्ज है, जो खुद में विरोधाभासी है।
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रिपोर्ट दर्ज कराई गई 11 जनवरी 2026 को, यानी लगभग 9 महीने बाद।
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लेकिन FIR के कॉलम में देरी का कारण शून्य है।
तीसरा सवाल: कार्रवाई में असमानता
तीनों आरोपी नामजद हैं, फिर भी—
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नेहरू साहू और अतिक उर रहमान न्यायिक रिमांड पर भेजे गए।
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महिला आरोपी सोनम कश्यप को कथित तौर पर थाने से ही छोड़ दिया गया।
– क्या कानून में लिंग के आधार पर अलग मापदंड हैं?
चौथा अंतर: FIR बनाम प्रेस भाषा
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FIR में विस्तृत बैंक खातों, नकद, फोन-पे, QR कोड तक का उल्लेख है।
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प्रेस विज्ञप्ति में मामला संक्षेप में समेट दिया गया, कई लेन-देन का ज़िक्र ही नहीं।
जब FIR कुछ कहे और पुलिस प्रेस नोट कुछ और,
तो सवाल आरोपियों पर नहीं,
सिस्टम की विश्वसनीयता पर उठता है।
यह सिर्फ ठगी का मामला नहीं—
यह रिकॉर्ड बनाम हकीकत की लड़ाई है।
अब जनता पूछ रही है—
सच FIR में है या प्रेस विज्ञप्ति में?















