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पारदर्शिता का दावा, जानकारी के लिए RTI का इंतजार! जिला शिक्षा अधिकारी संदीप पांडेय की कार्यशैली पर उठे सवाल
राज्य स्तरीय शालेय क्रीड़ा प्रतियोगिता के बजट का पत्र मांगने पर RTI का रास्ता, आवेदन के 10 दिन बाद भी जानकारी नहीं मिलने से बढ़ी नाराजगी
बिलासपुर। सरकारी कामकाज में पारदर्शिता और जवाबदेही प्रशासन की बुनियादी शर्तें हैं, लेकिन जब किसी विभाग से सार्वजनिक आयोजन के बजट से जुड़ी जानकारी मांगने पर भी सूचना का अधिकार (RTI) लगाने की सलाह मिले और आवेदन के बाद भी जानकारी का इंतजार करना पड़े, तो सवाल उठना स्वाभाविक है। बिलासपुर के जिला शिक्षा विभाग में 26वीं राज्य स्तरीय शालेय क्रीड़ा प्रतियोगिता से जुड़ी जानकारी का मामला अब इसी वजह से चर्चा में है। नए जिला शिक्षा अधिकारी संदीप पांडेय की कार्यशैली को लेकर भी सवाल उठने लगे हैं।
बिलासपुर में 7 से 10 अक्टूबर तक आयोजित 26वीं राज्य स्तरीय शालेय क्रीड़ा प्रतियोगिता के बजट को लेकर जब विभाग से जानकारी मांगी गई, तो बजट की राशि तो बता दी गई, लेकिन शासन से संबंधित पत्र उपलब्ध कराने के लिए RTI के माध्यम से जानकारी लेने की बात कही गई। इसके बाद सूचना प्राप्त करने के लिए आवेदन भी प्रस्तुत किया गया। अब आवेदन दिए हुए 9 दिन बीत चुके हैं, लेकिन संबंधित पत्र मिलने का इंतजार जारी है।
यहां सवाल केवल एक पत्र मिलने में हो रही देरी का नहीं, बल्कि उस प्रशासनिक रवैये का है जिसमें सामान्य जनहित से जुड़ी जानकारी के लिए भी आवेदक को औपचारिक प्रक्रिया का सहारा लेने को कहा जाता है।
बजट बता दिया, तो शासन का पत्र देने में परेशानी क्यों?
राज्य स्तरीय प्रतियोगिता कोई निजी आयोजन नहीं, बल्कि सरकारी व्यवस्था के अंतर्गत आयोजित कार्यक्रम है। ऐसे आयोजन में बजट कितना निर्धारित हुआ, शासन से कितनी राशि स्वीकृत हुई, किस आदेश के तहत राशि जारी की गई और किन मदों में खर्च की अनुमति दी गई—ये सभी सार्वजनिक धन के उपयोग और प्रशासनिक जवाबदेही से जुड़े महत्वपूर्ण प्रश्न हैं।
यदि विभाग बजट का आंकड़ा बता सकता है, तो उससे संबंधित शासनादेश या स्वीकृति पत्र की उपलब्धता और उसे प्राप्त करने की प्रक्रिया भी स्पष्ट की जा सकती है। यदि दस्तावेज उपलब्ध है और नियमानुसार दिया जा सकता है, तो सूचना मांगने वाले को अनावश्यक रूप से दूसरे रास्ते पर भेजने के बजाय निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार जानकारी उपलब्ध कराने की अपेक्षा की जाती है।
आखिर सार्वजनिक आयोजन के बजट से जुड़ा पत्र मांगना इतना मुश्किल क्यों हो कि आवेदक को RTI लगाने की सलाह देनी पड़े?
RTI के 9 दिन बाद भी इंतजार, लेकिन सवाल 30 दिन का नहीं, पारदर्शिता का है
सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 की धारा 7(1) के तहत सामान्यतः सूचना आवेदन प्राप्त होने के 30 दिनों के भीतर दी जानी होती है। ऐसे में आवेदन दिए जाने के 9 दिन बाद तक जानकारी नहीं मिलने का अर्थ अपने आप में यह नहीं है कि विभाग ने कानूनी समयसीमा का उल्लंघन कर दिया है। लेकिन इस अवधि में सूचना की स्थिति स्पष्ट न होना और दस्तावेज प्राप्त करने की प्रक्रिया को लेकर असमंजस बने रहना पारदर्शिता के दावों पर सवाल जरूर खड़े करता है।
यह भी ध्यान देने योग्य है कि RTI कानून में निर्धारित 30 दिन सूचना देने की सामान्य अधिकतम समयसीमा है, न कि हर आवेदन में सूचना रोककर रखने का औचित्य। यदि मांगी गई जानकारी उपलब्ध है और उस पर कोई वैधानिक अपवाद लागू नहीं होता, तो उसे समय पर उपलब्ध कराया जाना चाहिए। विभाग चाहे तो सूचना पहले भी दे सकता है।
इसलिए असली सवाल यह नहीं कि आवेदक को 30 दिन पूरे होने तक इंतजार करना ही पड़ेगा या नहीं, बल्कि यह है कि जब दस्तावेज उपलब्ध कराया जा सकता है, तो पारदर्शिता के प्रति सकारात्मक रवैया अपनाने में हिचकिचाहट क्यों दिखाई दे रही है?
मीडिया से संवाद में संकोच, आम नागरिकों की परेशानी का अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं
पत्रकारों का काम केवल अधिकारियों के बयान प्रकाशित करना नहीं, बल्कि सरकारी योजनाओं, बजट और प्रशासनिक फैसलों से जुड़े सवाल पूछना भी है। जनहित के विषयों पर सवालों का जवाब देना और उपलब्ध तथ्यों को स्पष्ट करना प्रशासनिक जवाबदेही का हिस्सा है।
यदि किसी मामले में तत्काल जानकारी उपलब्ध नहीं है, तो अधिकारी यह बता सकते हैं कि दस्तावेज कहां उपलब्ध है, उसे प्राप्त करने में कितना समय लगेगा या जानकारी देने में कोई वैधानिक बाधा है या नहीं। लेकिन हर बार RTI का रास्ता बताना संवाद की सहजता और पारदर्शिता की भावना पर प्रश्नचिह्न लगा सकता है।
मीडिया के साथ संवाद में यदि ऐसी स्थिति बनती है, तो यह सवाल उठना भी स्वाभाविक है कि आम नागरिकों को अपने काम के लिए विभागीय कार्यालयों में किस तरह की प्रक्रिया से गुजरना पड़ता होगा। हालांकि, इस आशंका की पुष्टि के लिए अलग-अलग मामलों के तथ्य जरूरी हैं, लेकिन प्रशासन को ऐसी स्थिति पैदा होने से रोकने के लिए अपनी सूचना व्यवस्था को अधिक जवाबदेह बनाना चाहिए।
प्रतियोगिता के खर्च का पूरा हिसाब सामने आना चाहिए
26वीं राज्य स्तरीय शालेय क्रीड़ा प्रतियोगिता के संबंध में विभाग को निम्न बिंदुओं पर स्पष्टता देनी चाहिए—
- प्रतियोगिता के लिए शासन से कितनी राशि स्वीकृत की गई?
- राशि स्वीकृत करने वाला शासनादेश या पत्र कौन-सा है?
- आयोजन के लिए निर्धारित बजट और वास्तविक व्यय में कितना अंतर रहा?
- विभिन्न मदों में कितनी राशि खर्च की गई और उसका लेखा-जोखा कहां उपलब्ध है?
- बजट संबंधी दस्तावेज उपलब्ध कराने के लिए RTI का सहारा लेने को क्यों कहा गया?
इन सवालों का उद्देश्य किसी अधिकारी पर बिना प्रमाण आरोप लगाना नहीं, बल्कि सार्वजनिक धन से आयोजित प्रतियोगिता के संबंध में तथ्य सामने लाना है। यदि विभाग की प्रक्रिया पूरी तरह नियमानुसार है, तो दस्तावेजों और स्पष्ट जवाबों से स्थिति अपने आप साफ हो सकती है।
पारदर्शिता बयान से नहीं, व्यवहार से साबित होती है
जिला शिक्षा अधिकारी संदीप पांडेय के सामने यह अवसर है कि वे इस मामले में सूचना की स्थिति स्पष्ट करें और उपलब्ध दस्तावेज नियमानुसार समय पर उपलब्ध कराएं। यदि जानकारी देने में कोई बाधा है, तो उसका आधार भी स्पष्ट किया जाना चाहिए।
सरकारी कार्यालयों में RTI नागरिकों का वैधानिक अधिकार है, लेकिन यह भी अपेक्षित है कि जनहित से जुड़ी उपलब्ध जानकारी पाने के लिए नागरिकों और पत्रकारों को हर बार अनावश्यक औपचारिकताओं का सामना न करना पड़े। पारदर्शी प्रशासन वह है जो सवालों से बचने के बजाय तथ्यों के साथ उनका जवाब देता है।
अब देखना यह है कि जिला शिक्षा विभाग प्रतियोगिता के बजट से संबंधित पत्र उपलब्ध कराकर पारदर्शिता के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दिखाता है या आवेदक को निर्धारित समयसीमा पूरी होने तक इंतजार करना पड़ता है।
क्योंकि सरकारी व्यवस्था में पारदर्शिता का वास्तविक अर्थ केवल नियमों का उल्लेख करना नहीं, बल्कि उन नियमों के अनुरूप जनता के प्रति जवाबदेह बने रहना भी है।







