बिलासपुर। सूचना के अधिकार अधिनियम, 2005 के तहत पारदर्शिता सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी निभाने वाला आदिवासी विभाग इन दिनों अपनी प्रशासनिक कार्यप्रणाली को लेकर चर्चा में है। विभाग में आरटीआई से संबंधित मामलों के निस्तारण में समन्वय और प्रक्रिया पालन को लेकर प्रश्न खड़े हुए हैं।
विभागीय सूत्रों से प्राप्त जानकारी के अनुसार, विभाग में सूचना के अधिकार से संबंधित प्रकरण देखने वाली अधिकारी के अवकाश पर जाने के दौरान किसी अन्य अधिकारी को विधिवत प्रभार नहीं सौंपा गया। इस कारण आरटीआई आवेदनकर्ताओं को निर्धारित समयसीमा में जानकारी प्राप्त करने में कठिनाइयों का सामना करना पड़ा तथा उन्हें विभाग के बार-बार चक्कर लगाने पड़े।
सूचना के अधिकार अधिनियम के तहत लोक प्राधिकरण पर समयबद्ध जानकारी उपलब्ध कराने की जिम्मेदारी निर्धारित है। ऐसे में प्रभार व्यवस्था स्पष्ट न होना प्रशासनिक समन्वय की कमी के रूप में देखा जा रहा है।
मामले को लेकर जब मीडिया प्रतिनिधियों ने सहायक आयुक्त संजय कुमार चंदेल से संपर्क किया, तो उनकी ओर से विस्तृत और स्पष्ट प्रतिक्रिया प्राप्त नहीं हो सकी। विभागीय स्तर पर औपचारिक स्पष्टीकरण सामने न आने से आवेदकों के बीच असंतोष की स्थिति बनी हुई है।
इसी क्रम में यह भी सामने आया कि अवकाश से लौटने के बाद संबंधित अधिकारी द्वारा उपलब्ध कराई गई जानकारी पर कार्यालयीन सील (विभागीय मुहर) अंकित नहीं थी। पूछे जाने पर अधिकारी ने बताया कि उनके पास सील उपलब्ध नहीं है। प्रशासनिक दृष्टि से अधिकृत दस्तावेजों पर कार्यालयीन सील का होना प्रमाणिकता की दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जाता है।
प्रशासनिक विशेषज्ञों का मत है कि सूचना का अधिकार अधिनियम पारदर्शिता और जवाबदेही का महत्वपूर्ण साधन है, अतः विभागीय स्तर पर प्रभार निर्धारण, अभिलेख प्रबंधन और दस्तावेज़ प्रमाणीकरण जैसी प्रक्रियाओं का सुव्यवस्थित होना आवश्यक है।
अब अपेक्षा की जा रही है कि संबंधित विभाग इस विषय पर स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी कर स्थिति को व्यवस्थित करेगा तथा भविष्य में ऐसी स्थिति की पुनरावृत्ति रोकने हेतु आवश्यक कदम उठाएगा।















