बिलासपुर में फर्जी मेडिकल बिल घोटाला : साधेलाल का कारनामा या सिस्टम की नाकामी?

फर्जी मेडिकल बिल कांड : साधेलाल अकेला दोषी या पूरा तंत्र जिम्मेदार?

बिलासपुर। जिला शिक्षा अधिकारी बिलासपुर द्वारा की गई जांच में शिक्षक एवं संकुल समन्वयक पौंसरा साधेलाल पटेल पर फर्जी चिकित्सा प्रतिपूर्ति देयक प्रस्तुत करने का मामला सामने आया है। जांच प्रतिवेदन के आधार पर संयुक्त संचालक शिक्षा संभाग बिलासपुर ने साधेलाल पटेल को तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया है तथा उनका मुख्यालय कार्यालय विकासखंड शिक्षा अधिकारी तखतपुर नियत किया गया है।

जांच में सामने आया कि—

  1. साधेलाल पटेल ने अपने नाम से 7.73 लाख का फर्जी मेडिकल देयक प्रस्तुत किया, जबकि वास्तविक बिल केवल 77 हजार का था और वह भी किसी अन्य व्यक्ति के नाम पर था।
  2. सहायक शिक्षक उमाशंकर चौधरी के नाम से 5.42 लाख का बिल प्रस्तुत किया गया, जबकि मेडिकल स्टोर द्वारा प्रदत्त वास्तविक बिल मात्र 1.43 लाख का था।
  3. पत्नी राजकुमारी पटेल के नाम से 4.03 लाख का बिल प्रस्तुत किया गया, जबकि वास्तविक देयक केवल 47 हजार का था।
  4. मृत शिक्षक नरेन्द्र कुमार चौधरी के नाम से मृत्यु के एक वर्ष बाद 5.33 लाख का फर्जी बिल लगाया गया, जबकि वास्तविक राशि मात्र 32 हजार थी।
  5. राजकुमारी पटेल के नाम से ही एक और 7.32 लाख का बिल दाखिल किया गया, जबकि मेडिकल रसीद मात्र 33 हजार की थी।
  6. सिविल सर्जन के अनुसार जिन देयकों की वास्तविक राशि 33,123 एवं 40,947 रुपये थी, उनमें कूटरचना कर करोड़ों का भुगतान दर्शाने की कोशिश की गई।

साधेलाल पटेल का यह कृत्य छत्तीसगढ़ सिविल सेवा (आचरण) नियम 1965 के नियम 3 एवं 16 का उल्लंघन माना गया है। यह गंभीर कदाचार की श्रेणी में आते हुए छ.ग. सिविल सेवा (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियम 1966 के तहत कार्रवाई की गई है।

 निलंबन अवधि में उन्हें नियमानुसार केवल जीवन निर्वाह भत्ता ही प्राप्त होगा।

फर्जी मेडिकल बिल घोटाला – सरकारी तंत्र की निगरानी पर उठे सवाल

साधेलाल पटेल द्वारा किया गया फर्जीवाड़ा केवल एक व्यक्ति का अपराध नहीं, बल्कि सरकारी तंत्र की गंभीर खामियों की ओर इशारा करता है। सवाल यह है कि—

– आखिर कैसे मृत शिक्षक के नाम से भी लाखों का बिल स्वीकृत हो गया?
– कैसे 77 हजार का वास्तविक बिल 7.73 लाख दिखाकर पास हो गया और किसी अधिकारी की नजर नहीं पड़ी?
-एक-दो नहीं बल्कि लगातार कई फर्जी बिल स्वीकृत होते रहे और सिस्टम खामोश रहा।

यह पूरा मामला बताता है कि चिकित्सा प्रतिपूर्ति की जांच व भुगतान प्रक्रिया कितनी कमजोर है। अगर साधेलाल पकड़ा नहीं जाता तो यह पैसा सरकारी खजाने से चुपचाप निकल जाता और किसी को भनक तक नहीं लगती।

विशेषज्ञों का कहना है कि यह घटना सिर्फ एक व्यक्ति की “स्मार्ट ट्रिक” नहीं बल्कि सिस्टम की निगरानी व्यवस्था में सेंध है। अधिकारियों की भूमिका, फाइल चेकिंग और अनुमोदन प्रक्रिया सभी पर सवाल उठना लाज़मी है।

आज सबसे बड़ा सवाल यही है—
क्या सरकारी सिस्टम इतना लचर है कि कोई भी कूटरचना कर करोड़ों का भुगतान निकलवा सकता है?
अगर हाँ, तो साधेलाल प्रकरण केवल एक घोटाला नहीं बल्कि पूरे प्रशासनिक ढांचे की चेतावनी घंटी है।

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