निलंबन के बाद बड़ा सवाल: विकास तिवारी को संरक्षण देने वाले अफसरों पर कब गिरेगी गाज?

आदेश की अवहेलना नहीं, प्रशासनिक सुस्ती बेनकाब

विकास तिवारी निलंबन प्रकरण: एक बाबू या पूरी व्यवस्था?

बिलासपुर। सहायक ग्रेड-02 विकास तिवारी का निलंबन अब कागज़ी आदेश बन चुका है, लेकिन यह कार्रवाई जितनी देर से आई है, उतने ही तीखे सवाल प्रशासन के माथे पर छोड़ गई है। मामला सिर्फ आदेश न मानने का नहीं, बल्कि सरकारी तंत्र की सुस्ती, चयनात्मक सख्ती और जवाबदेही के अभाव का आईना बन गया है।

छह महीने तक सिस्टम कहां था?

सरकारी रिकॉर्ड बताते हैं कि जून 2025 में स्थानांतरण, 01 जुलाई को विधिवत कार्यमुक्ति—इसके बावजूद छह महीने तक नई पदस्थापना में कार्यभार नहीं लिया गया।
सवाल सीधा है—
– क्या उपस्थिति रजिस्टर नहीं देखे गए?
– क्या वेतन, सेवा पुस्तिका और मासिक रिपोर्टिंग सिर्फ औपचारिकता बनकर रह गई?
– या फिर सब कुछ देखकर भी अनदेखा किया गया?

अगर कोई कर्मचारी महीनों तक गायब रहे और सिस्टम को पता न चले, तो यह लापरवाही नहीं, व्यवस्था की विफलता है।

हाई कोर्ट और सचिव समिति के बाद भी बेखौफ

मामला माननीय उच्च न्यायालय के आदेश के पालन में वरिष्ठ सचिवों की समिति तक गया। समिति ने साफ कहा—स्थानांतरण नीति 2025 का उल्लंघन नहीं हुआ, अभ्यावेदन अमान्य है। इसके बाद भी आदेशों की अवहेलना जारी रही।

यह आत्मविश्वास कहां से आया?
क्या कर्मचारी को यह भरोसा था कि कार्रवाई नहीं होगी?
और यदि था, तो यह भरोसा किसने दिलाया?

अब सख्ती, तब क्यों नहीं?

छत्तीसगढ़ सिविल सेवा नियमों के तहत अनाधिकृत अनुपस्थिति पर तत्काल कार्रवाई का प्रावधान है। फिर
जुलाई से दिसंबर तक प्रशासन क्या कर रहा था?
जनवरी 2026 में अचानक सख्ती यह साबित करती है कि
– कार्रवाई नियमों से नहीं, मूड और दबाव से होती है।

कार्रवाई सही, लेकिन समय पर क्यों नहीं?

निष्पक्षता से देखें तो निलंबन पूरी तरह वैधानिक और आवश्यक था।
लेकिन देरी ने इस कार्रवाई की धार कुंद कर दी।
समय पर होती तो यह नज़ीर बनती,
अब यह नुकसान नियंत्रण (Damage Control) जैसी लगती है।

कटघरे में एक नहीं, कई कुर्सियां

यह प्रकरण केवल विकास तिवारी का नहीं है।
यह सवाल उठाता है—
– निगरानी तंत्र पर
-विभागीय नियंत्रण पर
– और जिम्मेदार अधिकारियों की भूमिका पर

अगर एक बाबू छह महीने तक आदेशों को ठेंगा दिखा सकता है, तो दोष व्यक्ति में नहीं, व्यवस्था की ढील में है।

अब असली परीक्षा यह है कि क्या सिर्फ कर्मचारी निलंबित होगा, या यह भी तय होगा कि
इतने महीनों तक यह सब किसकी आंखों के सामने चलता रहा?

क्योंकि जब व्यवस्था सोती है, तब अनुशासन सबसे पहले मरता है।

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