बिलासपुर जिले में एक बार फिर भ्रष्टाचार पर सीधी चोट हुई है। मस्तूरी क्षेत्र के फूड इंस्पेक्टर श्याम वस्त्रकार को 90 हजार रुपये रिश्वत लेते हुए रंगे हाथों पकड़ लिया गया। आरोप है कि शासकीय उचित मूल्य की दुकान स्व सहायता समूह को आबंटित कराने और एसडीएम के समक्ष अनुकूल जांच रिपोर्ट प्रस्तुत करने के एवज में 1 लाख रुपये की मांग की गई थी।
यह कार्रवाई सिर्फ एक व्यक्ति की गिरफ्तारी नहीं, बल्कि उस व्यवस्था पर सवाल है जहां “फाइल आगे बढ़ाने” की कीमत तय होती है।
घूस की दर तय, गरीब की फाइल अटकी
मामला ग्राम विद्याडीह का है। स्व सहायता समूह ने तीन माह पूर्व दुकान आबंटन के लिए आवेदन किया था। लेकिन आबंटन आदेश की प्रक्रिया “रिपोर्ट” के नाम पर अटक गई।
यहां सबसे बड़ा सवाल है —
क्या शासकीय योजनाओं का लाभ पाने के लिए अब भी आम नागरिक को रिश्वत देना अनिवार्य समझ लिया गया है?
जब एक स्व सहायता समूह — जो महिलाओं और ग्रामीण आजीविका सशक्तिकरण का प्रतीक है — उसे भी “रेट” बताया जाए, तो यह सिर्फ भ्रष्टाचार नहीं, बल्कि शासन की मंशा पर भी चोट है।
लगातार चौथी ट्रैप: क्या यह सिस्टम में सड़ांध का संकेत?
आर्थिक अपराध अन्वेषण ब्यूरो (ACB/EOW) की यह इस वर्ष चौथी ट्रैप कार्रवाई बताई जा रही है। हाल ही में तहसीलदार, पटवारी, एसडीएम के बाबू और सीएसपीडीसीएल के अधिकारी-कर्मचारी भी गिरफ्त में आए हैं।
यह आंकड़ा दो बातें बताता है—
- या तो भ्रष्टाचार बहुत गहरा है
- या फिर एसीबी अब वास्तव में सक्रिय और आक्रामक है
सच शायद दोनों के बीच है।
बड़ा सवाल: क्या केवल ट्रैप से खत्म होगा भ्रष्टाचार?
ट्रैप कार्रवाई तात्कालिक राहत देती है। लेकिन स्थायी समाधान के लिए जरूरी है—
- संवेदनशील विभागों में डिजिटल फाइल ट्रैकिंग सिस्टम
- आबंटन और जांच रिपोर्ट की पब्लिक डिस्क्लोजर प्रक्रिया
- लोक सेवकों की संपत्ति की नियमित सार्वजनिक समीक्षा
- शिकायतकर्ता की पूर्ण गोपनीयता और सुरक्षा
अगर व्यवस्था पारदर्शी होगी तो “रिपोर्ट के बदले नोट” का खेल खुद कमजोर पड़ेगा।
स्व सहायता समूहों के नाम पर खेल?
शासकीय उचित मूल्य की दुकानों का आबंटन सामाजिक और आर्थिक दृष्टि से महत्वपूर्ण होता है। यदि यहां भी कमीशनखोरी का जाल फैलेगा, तो—
- गरीबों तक राशन वितरण की विश्वसनीयता प्रभावित होगी
- स्व सहायता समूहों का मनोबल गिरेगा
- पंचायत और प्रशासन की छवि धूमिल होगी
अब जनता भी जिम्मेदार
ACB ने अपील की है कि रिश्वत मांगने पर तुरंत सूचना दें।
यह सही समय है जब—
- लोग “दे दो और काम कराओ” मानसिकता छोड़ें
- प्रमाण जुटाकर शिकायत करें
- ट्रैप कार्रवाई में सहयोग करें
महेंद्र पटेल ने रिश्वत देने के बजाय शिकायत की — यही लोकतंत्र की ताकत है।
डर किसे लगना चाहिए?
इस कार्रवाई के बाद अब यह संदेश साफ है—
“जो मांगेगा, वह फंसेगा।”
लेकिन असली कसौटी होगी—
- क्या आरोपियों को सजा होगी?
- क्या विभागीय स्तर पर जवाबदेही तय होगी?
- क्या आबंटन प्रक्रिया पारदर्शी बनेगी?
अगर कार्रवाई केवल गिरफ्तारी तक सीमित रही, तो यह खबर बनकर रह जाएगी।
लेकिन यदि यह प्रशासनिक सुधार की शुरुआत बनी, तो इसे बिलासपुर में भ्रष्टाचार के खिलाफ निर्णायक मोड़ माना जाएगा।















