शिफ़ा की सदियों पुरानी रवायत : आधुनिक दौर में भी यूनानी चिकित्सा को नई पहचान देने में जुटीं प्रदेश की इकलौती सरकारी यूनानी डिस्पेंसरी की डॉ. सना अहमद खान

नेशनल डॉक्टर्स डे पर विशेष 

(डॉ. शगुफ्ता परवीन – सुरेन्द्र वर्मा, बिलासपुर)

बिलासपुर नेशनल डॉक्टर्स डे पर उन सभी चिकित्सकों को सलाम है, जो हर वक्त इंसानियत की बेहतरी और शिफ़ा की खातिर खामोशी से अपना फर्ज निभा रहे हैं।

आधुनिक चिकित्सा के इस तेज़ रफ्तार दौर में जहां एलोपैथी को प्राथमिकता दी जाती है, वहीं भारत की पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियों में शामिल यूनानी (तिब्ब) आज भी अपनी अलग पहचान बनाए हुए है। हालांकि आम लोगों के बीच इसकी जानकारी और उपयोगिता अपेक्षाकृत कम है, लेकिन यह भी सच है कि इसके माध्यम से कई पुरानी एवं जीवनशैली से जुड़ी बीमारियों का सफल उपचार किया जा रहा है।

यूनानी चिकित्सा केवल अवलेह या शरबत जैसी दवाइयों का नाम नहीं है, बल्कि यह इंसान के शरीर, उसकी तासीर (मिज़ाज), उम्र और जीवनशैली को समझकर संपूर्ण उपचार करने वाली चिकित्सा पद्धति है। आधुनिक चिकित्सा व्यवस्था के बीच भी यूनानी चिकित्सा की अपनी अहमियत है, जिसे समाज के हर वर्ग तक पहुँचाने की आवश्यकता है।

इसी विशेष अवसर पर हमने प्रदेश की इकलौती सरकारी यूनानी डिस्पेंसरी की चिकित्सा अधिकारी डॉ. सना अहमद खान से विशेष बातचीत की। उन्होंने यूनानी चिकित्सा को अपने पेशे के रूप में चुनने की वजह, बढ़ते मरीजों की संख्या, सेवा से मिलने वाली संतुष्टि तथा भविष्य की योजनाओं पर विस्तार से अपने विचार साझा किए।

रविशंकर विश्वविद्यालय, रायपुर से वर्ष 2009 में बैचलर ऑफ यूनानी मेडिसिन एंड सर्जरी (BUMS) की डिग्री प्राप्त करने के बाद डॉ. सना अहमद खान जून 2022 से बिलासपुर स्थित प्रदेश की इकलौती सरकारी यूनानी डिस्पेंसरी में यूनानी चिकित्सा अधिकारी के रूप में अपनी सेवाएं दे रही हैं।

डॉ. सना बताती हैं कि उन्होंने यूनानी चिकित्सा इसलिए चुनी क्योंकि यह सदियों से चली आ रही प्रमाणित चिकित्सा पद्धति है, जबकि एलोपैथी का विकास बाद के समय में हुआ। इसके अलावा यूनानी दवाइयों में शराब (अल्कोहल) का प्रयोग प्रतिबंधित है, जबकि अन्य कई चिकित्सा पद्धतियों में आवश्यकता अनुसार अल्कोहल का उपयोग किया जाता है।

उनका कहना है कि यूनानी चिकित्सा केवल बीमारी का इलाज नहीं करती, बल्कि व्यक्ति के पूरे मिज़ाज, खान-पान और जीवनशैली को ध्यान में रखते हुए बीमारी की जड़ पर काम करती है। यही कारण है कि उन्होंने यूनानी चिकित्सा को अपना जीवन-ध्येय बनाया।

डॉ. सना बताती हैं कि उनके इस निर्णय पर उनके परिवार—माता आयशा हाशिम (सेवानिवृत्त प्राचार्य), पिता शेख मोहम्मद हाशिम, पति अकील खान (व्यवसायी) तथा पुत्र आमिन खान—ने हमेशा सकारात्मक सहयोग दिया।

उन्होंने बताया कि सरकारी यूनानी अस्पताल में सभी वर्गों के मरीज इलाज के लिए आते हैं, लेकिन अधिकतर मरीज आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग से होते हैं। यहां पर डॉक्टर की परामर्श शुल्क नहीं ली जाती और शासन द्वारा उपलब्ध कराई गई दवाइयां भी निःशुल्क दी जाती हैं।

डॉ. सना के अनुसार अस्पताल सप्ताह में पांच दिन सुबह 9:00 बजे से शाम 4:00 बजे तथा शनिवार को सुबह से दोपहर 1:30 बजे तक खुला रहता है। यहां सभी प्रकार के मरीज आते हैं, लेकिन विशेष रूप से त्वचा रोग, जोड़ों के दर्द तथा अन्य पुराने दर्द से पीड़ित मरीजों की संख्या अधिक रहती है।

वे गर्व के साथ बताती हैं कि उनके कार्यभार संभालने के बाद मरीजों की संख्या में लगातार वृद्धि हुई है। कई बार मरीजों की अधिक भीड़ के कारण उन्हें दोपहर का भोजन भी टालना पड़ता है, लेकिन मरीजों का विश्वास बनाए रखना और उनके चेहरे पर उपचार के बाद लौटती मुस्कान देखना ही उनके लिए सबसे बड़ी संतुष्टि है।

डॉ. सना का मानना है कि यदि प्रदेश में सरकारी स्तर पर यूनानी चिकित्सा का व्यापक प्रचार-प्रसार किया जाए, यूनानी चिकित्सा महाविद्यालय स्थापित किए जाएं तथा स्कूल-कॉलेजों के पाठ्यक्रम में यूनानी चिकित्सा का परिचय शामिल किया जाए, तो आम जनता का इस चिकित्सा पद्धति पर विश्वास और अधिक बढ़ेगा।

उन्होंने यह भी कहा कि सोशल मीडिया और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म के माध्यम से भी यूनानी चिकित्सा का वैज्ञानिक एवं प्रभावी प्रचार किया जाना चाहिए। युवा डॉक्टरों और मेडिकल विद्यार्थियों को भी इस चिकित्सा पद्धति के प्रति समर्पित होकर कार्य करना चाहिए, जिससे समाज में यूनानी चिकित्सा को सम्मानजनक स्थान मिल सके।

अंत में उन्होंने युवाओं से नशे और मोबाइल के दुरुपयोग से दूर रहकर स्वस्थ जीवनशैली अपनाने की अपील की। साथ ही प्रदेश सरकार से आग्रह किया कि राजधानी रायपुर में भी एक सरकारी यूनानी चिकित्सालय शीघ्र स्थापित किया जाए, ताकि पूरे प्रदेश के लोगों को यूनानी चिकित्सा का लाभ मिल सके।

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