फादर्स डे पर खास पेशकश
(डॉ. शगुफ्ता परवीन – सुरेंद्र वर्मा, बिलासपुर)
फादर्स डे के मौके पर उन माताओं को खिराज-ए-अकीदत से नवाजना इत्तेफाक ही है, जो पिता के जिंदा होने के बावजूद उनकी गैरमौजूदगी में बच्चों के लिए मां और बाप दोनों का किरदार निभा रही हैं।
गुजिश्ता हफ्ते राज्य की बड़ी अदालत से एक अधेड़ पिता की वह याचिका खारिज हो गई, जिसमें उन्होंने विशेष आवश्यकता वाली अपनी ग्यारह वर्षीय बेटी की अभिरक्षा मां से लेकर उन्हें सौंपने की गुहार लगाई थी। जाहिर है कि अदालत का फैसला कानूनी और परिस्थितिजन्य साक्ष्यों पर आधारित रहा होगा।
अखबारों में छपी इस खबर पर कितने लोगों का ध्यान गया, कितनों ने इसे सरसरी तौर पर लिया और कितनों ने अपनी संवेदनहीनता से खामोशी अख्तियार की होगी, इसका केवल अनुमान लगाया जा सकता है। लेकिन इस खबर ने हमारे मन में कई महत्वपूर्ण सवाल खड़े कर दिए।
ऑटिज्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर सहित अन्य कारणों से पीड़ित स्पेशल चाइल्ड बच्चों की जिंदगी में पिता की कभी-कभार मौजूदगी या लगातार गैरमौजूदगी का उनके जज्बात और व्यवहार पर क्या असर पड़ता होगा? क्या मां की पूरी शिद्दत और परवरिश में पिता की अनुपस्थिति की भरपाई हो सकती है?
अक्सर हम पिता के त्याग, संघर्ष और जिम्मेदारियों के किस्से पढ़ते हैं, लेकिन जब किसी दांपत्य में अलगाव या तलाक हो जाए और अदालत को किसी बच्चे की कस्टडी का फैसला करना पड़े, तब सबसे बड़ा सवाल यही होता है कि उस बच्चे के मानसिक, शारीरिक विकास और जीवन की गुणवत्ता पर इसका क्या प्रभाव पड़ेगा?
इन्हीं सवालों के जवाब तलाशने के लिए हमने स्थानीय स्पेशल चाइल्ड स्कूलों के संचालकों और अभिभावकों से बातचीत की।
“मैं एक सिंगल मदर हूं…”
40 वर्षीय श्रीमती माधुरी डोडवानी कहती हैं—
“मैं एक सिंगल मदर हूं। बच्चों का पालन-पोषण मुझे अकेले ही करना पड़ रहा है। मेरा जीवन चुनौतियों से भरा है। फिर भी मेरे जीवन का उद्देश्य मेरे दोनों बच्चे हैं। वे बाकी बच्चों की तरह बोल नहीं सकते, चीजों को समझ नहीं सकते। यहां तक कि मैं उनकी मां हूं, यह एहसास भी वे व्यक्त नहीं कर पाते।”
वे बताती हैं कि जब पहली बार बच्चों की शारीरिक और मानसिक स्थिति का पता चला तो उनकी दुनिया जैसे थम गई थी।
डॉक्टरों ने कहा कि जब तक आप जीवित हैं, आपको अपने बच्चों की छाया बनकर उनके साथ रहना होगा। लेकिन विडंबना यह है कि उनके बच्चों के जीवन में पिता की कोई भूमिका नहीं है।
माधुरी कहती हैं—
“इसीलिए मैं अपने दोनों बच्चों के लिए मजबूर पिता भी हूं और मजबूर मां भी। एक निजी स्कूल में शिक्षिका हूं। नौकरी पर जाने के लिए बच्चों को कमरे में बंद कर जाना पड़ता है। कई बार वे मुझे रोकने दौड़ते हैं, मानो कह रहे हों कि मत जाओ। उस समय दिल पर पत्थर रखकर जाना पड़ता है, क्योंकि बिना कमाई के घर नहीं चल सकता।”
वे आगे कहती हैं—
“समाज से मुझे केवल सहानुभूति मिली है, लेकिन केवल शब्दों और संवेदनाओं से जिंदगी नहीं चलती। संघर्ष मुझे ही करना है और मैं पूरी शिद्दत से कर रही हूं। मुझे खुशी है कि हम तीनों एक-दूसरे के जीने का मकसद बन गए हैं।”
एक और मां की कहानी
श्रीमती रश्मि बताती हैं कि उनके पति परिवार के भरण-पोषण में व्यस्त रहते हैं, जबकि बच्चे की देखभाल की पूरी जिम्मेदारी उन पर है।
एक बार उनके विशेष आवश्यकता वाले बच्चे ने गलती से अपनी दवा जरूरत से ज्यादा मात्रा में खा ली। उस समय वे घबरा गईं और डॉक्टर से संपर्क किया। सौभाग्य से कोई बड़ा नुकसान नहीं हुआ, लेकिन वह घटना आज भी उन्हें डरा देती है।
एक अन्य घटना में बच्चे ने घर में रखे ब्लेड से अपनी उंगली काट ली। विशेष बच्चों को कई बार दर्द का एहसास सामान्य बच्चों की तरह नहीं होता, इसलिए चोट लगने के बावजूद वे सामान्य बने रहते हैं। ऐसे में माता-पिता की जिम्मेदारी कई गुना बढ़ जाती है।
रश्मि कहती हैं—
“मेरा बच्चा भी सामान्य बच्चों की तरह बाहर खेलना चाहता है, लेकिन मैं उसे भेज नहीं सकती। मैं कभी उसके लिए मां बनती हूं, कभी पिता, कभी दोस्त और कभी घोड़ा बनकर उसे अपनी पीठ पर घुमाती हूं।”
सलाम उन माताओं को…
इन दोनों कहानियों के साथ-साथ समाज में ऐसी असंख्य माताएं हैं जो अपने विशेष बच्चों की परवरिश में मां और पिता दोनों की भूमिका निभा रही हैं।
उनका त्याग, उनका संघर्ष, उनकी कुर्बानियां और उनका बेपनाह प्यार समाज के लिए एक मिसाल है।
ऐसी सभी माताओं को फिर से इस्तकबालिया सलाम… सेल्यूट!















