बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच (चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा एवं जस्टिस बीडी गुरू) ने मस्तूरी रोड पर युवाओं द्वारा कारों में खतरनाक स्टंट करने और पुलिस की ढीली कार्रवाई पर कड़ी टिप्पणी की है। कोर्ट ने साफ कहा – “गरीब, मध्यम वर्ग और दलित पर तो पुलिस का कोप बरसता है, लेकिन जब अपराधी कोई बाहुबली, धनी या राजनीतिक रसूखदार हो तो पुलिस अधिकारी नख-दंतहीन बाघ बन जाते हैं।”
कारें जब्त होने के बावजूद कोर्ट ने पुलिस पर सवाल उठाते हुए आदेश दिया कि इन वाहनों को हाईकोर्ट की अनुमति के बिना नहीं छोड़ा जाएगा। साथ ही, मुख्य सचिव से शपथपत्र में जवाब तलब किया गया है कि अपराधियों पर अब तक क्या ठोस कार्रवाई हुई।
कोर्ट की तल्ख टिप्पणी से SSP रजनेश सिंह की फिर किरकिरी
यह पहली बार नहीं है जब पुलिस की कार्रवाई को ‘दिखावा’ बताया गया हो। हाईकोर्ट ने साफ शब्दों में कहा कि *“ऐसे अपराधियों पर कार्रवाई ऐसी होनी चाहिए जो जीवन भर के लिए सबक बन जाए। लेकिन पुलिस ने महज़ खानापूर्ति की है।
यानी साफ है कि पुलिस सिर्फ गरीब पर सख्त और रसूखदार पर नरम है। यही दोहरा रवैया अब हाईकोर्ट की नजर में भी आ चुका है।
शायद TI और अन्य अधिकारी भी SSP की हिदायतों को नहीं मान रहे
जमीनी हकीकत यह है कि कई थाना प्रभारी SSP रजनेश सिंह के निर्देशों को भी हल्के में ले रहे हैं। जब कप्तान के आदेश को ही गंभीरता से न लिया जाए, तो फिर आम जनता को न्याय कैसे मिलेगा? यही कारण है कि बार-बार SSP की साख पर सवाल उठ रहे हैं और कोर्ट की फटकार भी उन्हीं पर भारी पड़ रही है।
पुलिस पर सवाल, SSP पर निशाना
* क्या SSP सिर्फ आदेश देने तक सीमित हैं?
* क्यों TI और अधीनस्थ उनकी बातों को हवा में उड़ा रहे हैं?
* हाईकोर्ट की नाराज़गी के बाद भी क्या SSP सख्ती दिखा पाएंगे?
मस्तूरी रोड पर स्टंट करने वाले युवकों का मामला अब SSP रजनेश सिंह के लिए गले की हड्डी बन चुका है। कोर्ट की इस तरह के मामले में की जा रही टिप्पणी सीधे पुलिस कप्तान की नाकामी उजागर कर रही है। सवाल ये है कि SSP कब तक इस तरह के मामलों केवल दिखावे की कार्रवाई में उलझे रहेंगे और कब पुलिस सच में जनता के लिए ‘खौफ’ और अपराधियों के लिए ‘सबक’ बनेगी?















