5वीं मंज़िल तक पहुंचना बना मिशन इम्पॉसिबल, अफसर नदारद—आम आदमी संघर्ष में
स्मार्ट सिटी में ‘स्मार्ट’ न लिफ्ट, न अफसर—सुविधा गायब, जवाबदेही लापता
बिलासपुर की स्मार्ट सिटी अब सुविधा का नहीं, सहनशक्ति का इम्तिहान बन चुकी है। जिस दफ्तर से शहर को “स्मार्ट” बनाने के दावे किए जाते हैं, उसी स्मार्ट सिटी कार्यालय में बुनियादी सुविधा तक नसीब नहीं।
स्थिति यह है कि कार्यालय की दो लिफ्टों में से एक तीन महीनों से बंद पड़ी है, जबकि दूसरी पिछले एक हफ्ते से खराब है। नतीजा—
5वीं मंज़िल पर स्थित स्मार्ट सिटी कार्यालय तक पहुंचना आम आदमी के लिए किसी टास्क से कम नहीं।
ऑफिस पहुंचने से पहले लोग सीढ़ियां ढूंढते हैं, और अगर मिल भी जाएं तो पांच मंज़िल चढ़ना मजबूरी है। यह वही स्मार्ट सिटी है, जहां हर प्रेज़ेंटेशन में “ईज़ ऑफ लिविंग” और “इन्क्लूसिव इंफ्रास्ट्रक्चर” के बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं।
सबसे बड़ा सवाल—
– बुजुर्ग, दिव्यांग और बीमार व्यक्ति क्या करें?
– क्या स्मार्ट सिटी ऑफिस सिर्फ जवानों और सीढ़ी चढ़ने वालों के लिए है?
हैरानी की बात यह है कि तीन महीने से खराब लिफ्ट की मरम्मत तक नहीं हो सकी।
क्या स्मार्ट सिटी के पास बजट नहीं है?
या फिर अधिकारियों की मंज़िल नीचे है, इसलिए ऊपर चढ़ने वालों का दर्द समझ नहीं आता?
अफसर गायब, व्यवस्था बेहाल
मामला सिर्फ लिफ्ट का नहीं है। मिली जानकारी के अनुसार पूर्व MD अमित कुमार के कार्यकाल में स्मार्ट सिटी के अधिकारियों को निगम कार्यालय में बैठकर काम करने के निर्देश दिए गए थे।
नतीजा यह हुआ कि पिछले कई महीनों से अधिकांश अधिकारी स्मार्ट सिटी कार्यालय में आते ही नहीं।
यानि—
-ऑफिस है, पर अफसर नहीं
-योजनाएं हैं, पर जिम्मेदारी नहीं
– स्मार्ट सिटी है, पर संवेदनशीलता शून्य
प्रशासनिक संवेदनहीनता का जीता-जागता उदाहरण
जिस दफ्तर से शहर के विकास की दिशा तय होती है, वही दफ्तर खुद बुनियादी सुविधा देने में फेल है।
यह महज़ लापरवाही नहीं, बल्कि प्रशासनिक संवेदनहीनता और जवाबदेही से भागने की मानसिकता को उजागर करता है।
अब सवाल यह नहीं कि लिफ्ट कब ठीक होगी—
सवाल यह है कि
– जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई कब होगी?
– ऑफिस में न आने वाले अफसरों से जवाबदेही कौन तय करेगा?
स्मार्ट सिटी का मतलब सिर्फ LED लाइट और प्रेज़ेंटेशन नहीं,
आम आदमी तक पहुंचने की सुविधा और अफसरों की मौजूदगी भी है।















